क्या इजराइल के पतन की उल्टी गिनती शुरू?
नई दिल्ली । डेस्क: हाल के वर्षों में इजराइल एक ऐसे मोड़ पर खड़ा नजर आ रहा है जहाँ युद्ध से कहीं अधिक गंभीर खतरा उसके अपने आंतरिक ढांचे से उत्पन्न हो रहा है. विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों, अर्थशास्त्रियों और इजराइली प्रवासियों की भविष्यवाणियां एक बेहद चिंताजनक तस्वीर पेश करती हैं. इन विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इजराइल ने अपना वर्तमान रास्ता नहीं बदला, तो आने वाले दशकों में वह एक क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में अपनी स्थिति खो देगा और संभवतः अपने वर्तमान स्वरूप में उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा.
राजनीतिक अर्थशास्त्री शिर हेवर और नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल के पूर्व प्रमुख यूजीन कांदेल जैसे विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इजराइल अपने गठन के सौ साल (2048) पूरे करने से पहले ही एक बड़े पतन या आमूल-चूल बदलाव का शिकार हो सकता है. यह बदलाव वैसा ही हो सकता है जैसा 1994 में रंगभेद के खात्मे के बाद दक्षिण अफ्रीका में या 1990 में एकीकरण के बाद पूर्वी जर्मनी में देखा गया था.
इस संभावित पतन का सबसे बड़ा कारण फिलिस्तीन के साथ संघर्ष नहीं, बल्कि इजराइल के भीतर बढ़ता सामाजिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण है. इजराइली समाज स्पष्ट रूप से तीन धड़ों में बंट चुका है. उदारवादी धर्मनिरपेक्ष यहूदी, धार्मिक यहूदी राष्ट्र चाहने वाले कट्टरपंथी, और वे जो यहूदियों व फिलिस्तीनियों के लिए समान अधिकारों की वकालत करते हैं. वर्तमान में सबसे तीखा संघर्ष उदारवादी और कट्टरपंथियों के बीच है.
बेंजामिन नेतन्याहू सरकार द्वारा न्यायपालिका को कमजोर करने के प्रयासों और गाजा में चल रहे युद्ध ने इस खाई को और चौड़ा कर दिया है. इसका सीधा असर देश की जनसांख्यिकी और अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. इजराइल की ताकत माना जाने वाला धर्मनिरपेक्ष उच्च-शिक्षित वर्ग, जिसमें तकनीकी उद्यमी और डॉक्टर शामिल हैं, तेजी से देश छोड़ रहा है. आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो वर्षों में 1.5 लाख से अधिक लोग इजराइल छोड़कर जा चुके हैं.
पलायन का यह सिलसिला इजराइल के लिए आर्थिक रूप से घातक साबित हो रहा है. इजराइल की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से लगभग 3 लाख विशिष्ट पेशेवरों के कंधों पर टिकी है. यदि यह वर्ग देश छोड़ देता है, तो इजराइल एक विकसित अर्थव्यवस्था से गिरकर विकासशील देशों की श्रेणी में आ सकता है.
दूसरी ओर, अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स (कट्टरपंथी धार्मिक) समुदाय की आबादी तेजी से बढ़ रही है, जो मुख्य रूप से सरकारी सब्सिडी पर निर्भर है और अर्थव्यवस्था में उनका योगदान बेहद कम है. अनुमान है कि 2065 तक एक औसत इजराइली परिवार पर इन समुदायों को पालने का आर्थिक बोझ तीन गुना बढ़ जाएगा.
साथ ही, युद्ध की स्थिति और राजनीतिक अस्थिरता के कारण विदेशी निवेशकों का भरोसा भी डगमगा गया है. निवेशक अब अपनी पूंजी इजराइल के बजाय विदेशों में लगा रहे हैं, जिससे देश के टेक सेक्टर और रक्षा उद्योग को मिलने वाली ऑक्सीजन कम हो रही है.
विशेषज्ञों का कहना है कि एक 'औपनिवेशिक' या विस्तारवादी राज्य बने रहने के लिए अत्यधिक धन और एक मजबूत सैन्य-तकनीकी ढांचे की आवश्यकता होती है. यदि इजराइल का मुख्य कार्यबल और निवेशक देश से बाहर चले जाते हैं, तो वह अपनी वर्तमान सैन्य शक्ति और जीवन स्तर को बनाए रखने में सक्षम नहीं होगा.
हालांकि, अमेरिका के साथ अरबों डॉलर के रक्षा सौदे फिलहाल उसे सुरक्षा प्रदान कर रहे हैं, लेकिन आंतरिक दरारें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि उन्हें केवल सैन्य शक्ति से नहीं भरा जा सकता.
विश्लेषक योसी मेकेलबर्ग के अनुसार, लोकतंत्र एक दिन में खत्म नहीं होते, बल्कि वे धीरे-धीरे अपनी पहचान खोते जाते हैं. यदि वर्तमान सरकार की नीतियां और कट्टरपंथ का प्रभाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो इजराइल आने वाले वर्षों में अपनी उस उदारवादी लोकतांत्रिक पहचान को पूरी तरह खो देगा जिसके दम पर उसने वैश्विक स्तर पर अपनी साख बनाई थी.
अंततः, प्रतिभाओं का पलायन और आर्थिक बोझ ही इजराइल के भविष्य को अंधकारमय बना रहे हैं.