क्या बांग्लादेश ने बदलाव का ऐतिहासिक अवसर गंवा दिया?
ढाका । डेस्क: बांग्लादेश के राजनीतिक इतिहास का एक बेहद उतार-चढ़ाव भरा अध्याय 12 फरवरी को होने वाले आम चुनावों के साथ समाप्त होने जा रहा है. अगस्त 2024 में शेख हसीना के 15 साल के शासन के पतन के बाद सत्ता संभालने वाले नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ. मुहम्मद यूनुस अब विदाई की तैयारी में हैं. 18 महीनों के इस अंतरिम शासन के बाद देश एक बार फिर चुनावी मोड में है, लेकिन जनता के बीच इस बात को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है कि क्या यूनुस ने देश को स्थिरता दी या वह उन बुनियादी ढांचागत बदलावों को लाने में विफल रहे जिनका वादा छात्र आंदोलन के दौरान किया गया था.
यूनुस के 18 महीनों के कार्यकाल को व्यापक सुधारों की कोशिश के रूप में देखा जाएगा. उन्होंने चुनाव प्रणाली, न्यायपालिका, पुलिस और संविधान में सुधार के लिए कई आयोगों का गठन किया. उनके शासनकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि शेख हसीना के दौर में हुए मानवाधिकार हनन और जबरन गायब किए जाने (enforced disappearances) के मामलों की जांच रही.
'आईनाघर' जैसे गुप्त यातना केंद्रों का खुलासा और गायब लोगों की तलाश के लिए बने आयोग ने 1,900 से अधिक शिकायतें दर्ज कीं.
हाल ही में अदालत द्वारा ढाका के पूर्व पुलिस प्रमुख को मौत की सजा सुनाया जाना उस न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया, जिसकी मांग छात्र प्रदर्शनकारियों के परिजन कर रहे थे.
हालांकि, इन उपलब्धियों के बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का एक धड़ा मानता है कि यूनुस प्रशासन नौकरशाही पर लगाम कसने और आर्थिक मोर्चे पर घरेलू स्तर पर बड़ी राहत देने में पिछड़ गया. घरेलू बाजार में महंगाई, बेरोजगारी और रुकी हुई विदेशी पूंजी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है.
चुनाव के मुहाने पर खड़े बांग्लादेश में अब 'यूनुस विरासत' पर राजनीति तेज है. मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का मानना है कि एक अनिर्वाचित सरकार को इतने लंबे समय तक पद पर नहीं रहना चाहिए था और व्यापक सुधारों का काम चुनी हुई संसद पर छोड़ देना चाहिए था.
दूसरी ओर, छात्र नेताओं द्वारा बनाई गई नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) और जमात-ए-इस्लामी जैसे दल और गहरे सुधारों के पक्षधर थे.
डॉ. यूनुस ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए मतदान के दिन ही सुधारों पर जनमत संग्रह (रेफरेंडम) कराने का निर्णय लिया है. यदि जनता इन सुधारों को मंजूरी देती है, तो अगली संसद को उन पर फैसला लेना होगा.
85 वर्षीय यूनुस ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की साख तो बहाल की, लेकिन घरेलू राजनीति की जटिलताओं और सड़कों पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों ने उनके काम की गति को प्रभावित किया.
अब 12 फरवरी को होने वाले चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का जरिया नहीं हैं, बल्कि इस बात का फैसला भी करेंगे कि यूनुस द्वारा बोए गए सुधारों के बीज भविष्य में फल दे पाएंगे या बांग्लादेश फिर से उसी पुराने ढर्रे पर लौट जाएगा.