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ग्रेट निकोबार परियोजना: सामरिक जरूरत या विनाशकारी विकास?

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03 जून 2026, 07:27 PM 4 मिनट में पढ़ें 1

ग्रेट निकोबार लाईट हाऊस
ग्रेट निकोबार लाईट हाऊस

नई दिल्ली । डेस्क: भारत का सबसे सुदूर दक्षिणी छोर, ग्रेट निकोबार द्वीप, मुख्य भूमि भारत की तुलना में थाईलैंड, मलेशिया और इंडोनेशिया के तटों के अधिक करीब है. हॉन्गकॉन्ग के आकार वाले इस द्वीप पर साल 1984 में इंदिरा गांधी के बाद से किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने कदम नहीं रखा है. देश इस द्वीप पर पूर्ण जनगणना तक नहीं कराता और केवल अनुमानों पर निर्भर है, जिसके अनुसार यहाँ की आबादी 10,000 से भी कम है. 


इसके बावजूद, यह शांत द्वीप इस समय एक बड़े राजनीतिक तूफान के केंद्र में आ गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा हिंद महासागर में एक प्रमुख सामरिक और आर्थिक केंद्र विकसित करने के लिए यहाँ 11 बिलियन डॉलर (लगभग 91,000 करोड़ रुपये) की महात्वाकांक्षी परियोजना को हरी झंडी दी गई है, जिस पर अब देश-विदेश में तीखी बहस छिड़ गई है.


आर्थिक और सामरिक प्राथमिकताओं में बदलाव:


केंद्र सरकार ने अपने शुरुआती ब्लूप्रिंट में इस मेगा प्रोजेक्ट के पीछे समुद्री व्यापार के आर्थिक फायदों को मुख्य आधार बताया था. सरकार की योजना यहाँ एक विशाल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, सैन्य-नागरिक हवाई अड्डा, बिजली संयंत्र, पर्यटन बुनियादी ढांचा और अगले तीन दशकों में लगभग 3.5 लाख लोगों के रहने के लिए एक आधुनिक टाउनशिप बनाने की है. 


हालांकि, जैसे ही इस योजना को वैश्विक पर्यावरण संगठनों और नई दिल्ली में विपक्षी दलों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा, सरकार ने अपनी रणनीति और नैरेटिव को बदल दिया. अब इस परियोजना को देश की राष्ट्रीय सुरक्षा और पड़ोस में सामरिक लक्ष्यों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताया जा रहा है. 


मई में जारी एक आधिकारिक बयान में सरकार ने स्वीकार किया कि इस परियोजना का उद्देश्य अंडमान सागर और दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की सैन्य व रक्षा उपस्थिति को मजबूत करना है.


मलक्का जलडमरूमध्य पर भारत की नजर:


वैश्विक राजनीति के जानकारों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने इस तरह के समुद्री ठिकानों के महत्व को और बढ़ा दिया है. ग्रेट निकोबार द्वीप सीधे तौर पर मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित है, जहाँ से दुनिया का एक तिहाई व्यापार और समुद्री तेल गुजरता है. यह जलमार्ग विशेष रूप से चीन के लिए जीवन रेखा की तरह है, क्योंकि उसका 80 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात और दो-तिहाई व्यापार इसी रास्ते से होता है. 


पूर्व नौसेना उपप्रमुख शेखर सिन्हा के अनुसार, इस भौगोलिक स्थिति के कारण ग्रेट निकोबार भारत के लिए एक बेहतरीन संतरी की भूमिका निभा सकता है, जिससे पूरे समुद्री क्षेत्र की गतिविधियों पर पैनी नजर रखी जा सकेगी. 


हालांकि, उन्होंने युद्ध की स्थिति में मलक्का जलडमरूमध्य की नाकेबंदी करने के विचारों को खारिज करते हुए कहा कि इतनी बड़ी समुद्री सीमा पर पूर्ण नाकेबंदी बनाए रखना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है, लेकिन यह द्वीप भारत की समुद्री जागरूकता को जरूर मजबूत करेगा.


जनजातीय विरासत और पर्यावरण पर 'मृत्युदंड' का खतरा:


इस विशाल विकास कार्य का दूसरा पहलू बेहद चिंताजनक और डरावना है, जिसने स्थानीय स्तर पर भारी आक्रोश पैदा कर दिया है. द्वीप के मूल निवासियों ने अपनी जमीन देने से साफ इनकार कर दिया है और अदालतों का दरवाजा खटखटाया है. लगभग 1000 वर्ग किलोमीटर में फैले इस द्वीप का 16 प्रतिशत हिस्सा इस परियोजना की जद में आ रहा है, जिसका आधा भाग उन जनजातीय आरक्षित क्षेत्रों से ओवरलैप होता है जहाँ शोम्पेन और निकोबारी समुदाय रहते हैं. 


शोम्पेन एक अर्ध-खानाबदोश शिकारी जनजाति है, जो बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटी हुई है. फरवरी 2024 में दुनिया भर के 39 नरसंहार विशेषज्ञों ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी कि यह परियोजना शोम्पेन जनजाति के लिए 'मृत्युदंड' जैसी साबित होगी, जो अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के तहत नरसंहार के समान है. 


इसके अलावा, संसद में दी गई जानकारी के अनुसार इस परियोजना के लिए लगभग 9.64 लाख पेड़ काटे जाएंगे, जिससे द्वीप का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पूरी तरह तबाह हो जाएगा.


राहुल गांधी का हमला और भूकंप का साया:


राजनीतिक मोर्चे पर विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने हाल ही में इस द्वीप का दौरा कर स्थानीय कार्यकर्ताओं और प्रभावित लोगों से मुलाकात की. उन्होंने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए इसे विकास के नाम पर विनाश बताया और दावा किया कि ग्रेट निकोबार परियोजना देश की प्राकृतिक और जनजातीय विरासत के खिलाफ हमारे जीवनकाल के सबसे बड़े घोटालों और गंभीर अपराधों में से एक है. 


विशेषज्ञों ने यह भी ध्यान दिलाया है कि यह द्वीप भूकंपीय क्षेत्र 5 (Seismic Zone 5) के अंतर्गत आता है, जो सबसे खतरनाक भूकंपीय श्रेणी है. साल 2004 में आई विनाशकारी सुनामी के कारण इंदिरा पॉइंट के पास की जमीन लगभग 4.25 मीटर नीचे धंस गई थी, जिसका गवाह आज भी आधा डूबा हुआ लाइटहाउस है. 


ऐसे संवेदनशील और आपदा-संभावित क्षेत्र में इतनी बड़ी कंक्रीट की संरचनाएं बनाना भारी जोखिम को दावत देने जैसा है. आलोचकों का कहना है कि सरकार अपने व्यावसायिक एजेंडे को छिपाने के लिए राष्ट्रवाद और सुरक्षा का सहारा ले रही है, जो भविष्य में भारत के लिए एक बड़ी देनदारी बन सकता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP