'मिक्सोपैथी' का विरोध और समर्थन
नई दिल्ली । डेस्क: केन्द्र सरकार द्वारा एलोपैथी और आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति को मिलाकर नया पाठ्यक्रम का देशभर में विरोध तथा समर्थन शुरू हो गया है. केंद्र सरकार द्वारा पुदुचेरी के जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (JIPMER) में एमबीबीएस (बैचलर ऑफ मेडिसिन, बैचलर ऑफ सर्जरी) और बीएएमएस (बैचलर ऑफ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी) को मिलाकर एक नया एकीकृत चिकित्सा पाठ्यक्रम शुरू करने की योजना की खबरें सामने आई हैं.
यह पाठ्यक्रम अभी विचाराधीन है, और इसके लिए नया पाठ्यक्रम तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है. इस प्रस्ताव ने चिकित्सा जगत में तीखी बहस छेड़ दी है, जहां आयुर्वेद समुदाय इसका समर्थन कर रहा है, वहीं आधुनिक चिकित्सा के विशेषज्ञ इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं.
आयुर्वेद समुदाय, विशेष रूप से आयुर्वेद मेडिसिन मैन्युफैक्चरर्स ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया (AMMOI) का कहना है कि यह एकीकृत पाठ्यक्रम आधुनिक चिकित्सा की ताकत को आयुर्वेद की समग्र दृष्टिकोण के साथ जोड़कर देश में अधिक व्यक्तिगत और व्यापक स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित करेगा. उनका मानना है कि यह एक प्रगतिशील और वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त दृष्टिकोण है, जिसका दायरा आने वाले वर्षों में और बढ़ेगा.
वे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और कई देशों द्वारा पारंपरिक चिकित्सा को अपने स्वास्थ्य प्रणालियों में शामिल करने की पहल का हवाला देते हैं. आयुर्वेद विशेषज्ञों का कहना है कि यह एकीकरण न केवल आधुनिक चिकित्सकों को आयुर्वेद की संभावनाओं को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगा, बल्कि उपचार के क्षेत्र में नई संभावनाएं भी खोलेगा. उनका यह भी तर्क है कि वैश्विक स्तर पर पारंपरिक चिकित्सा की स्वीकार्यता बढ़ रही है, और विभिन्न उपचार पद्धतियों का यह एकीकृत विकास उत्कृष्ट अवसर प्रदान करेगा.
दूसरी ओर, आधुनिक चिकित्सा के चिकित्सक, विशेष रूप से इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने इस कदम को 'मिक्सोपैथी' करार देते हुए इसका कड़ा विरोध किया है. IMA का कहना है कि विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों का यह अवैज्ञानिक मिश्रण न तो डॉक्टरों के लिए और न ही मरीजों के लिए फायदेमंद होगा.
उनका तर्क है कि भारत में जीवन प्रत्याशा 1947 में 32 वर्ष से बढ़कर 2025 में 70.8 वर्ष हो गई है, जो चेचक और नवजात टेटनस जैसी बीमारियों के उन्मूलन, टीकों, और आधुनिक मातृ-शिशु स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच के कारण संभव हुआ है.
IMA ने तपेदिक, प्लेग, हैजा और टाइफाइड जैसी बीमारियों के उपचार में एंटीबायोटिक्स और अन्य आधुनिक दवाओं की सकारात्मक भूमिका को रेखांकित किया. इसके अलावा, कैंसर देखभाल में प्रगति, मधुमेह और उच्च रक्तचाप के लिए इंसुलिन और अन्य दवाओं का आगमन, साथ ही हृदय रोगों और स्ट्रोक के प्रबंधन में हुई प्रगति ने स्वास्थ्य सेवा पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया है.
IMA ने सरकार से इस एकीकृत पाठ्यक्रम के फैसले को वापस लेने की मांग की है और चीन का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां आधुनिक और पारंपरिक चीनी चिकित्सा के मिश्रण का प्रयोग विफल रहा, जिसके परिणामस्वरूप उनकी पारंपरिक चिकित्सा का ह्रास हुआ.
IMA ने इस कदम को 'क्वैकरी' को बढ़ावा देने वाला बताते हुए चेतावनी दी है कि इससे 'हाइब्रिड डॉक्टर' तैयार होंगे, जो केवल अयोग्य क्वैक होंगे. उनका कहना है कि सभी चिकित्सा प्रणालियों को उनकी मूल शुद्धता में बनाए रखा जाना चाहिए. दूसरी ओर, आयुर्वेद समुदाय इसे एक प्रगतिशील कदम मानता है, जो स्वास्थ्य सेवा में नए आयाम जोड़ेगा.
वर्तमान में भारत में 779 मेडिकल कॉलेज और प्रति वर्ष 1,36,325 एमबीबीएस डॉक्टरों के साथ एक मजबूत अस्पताल और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क मौजूद है.
इस पृष्ठभूमि में सरकार को इस मुद्दे पर सावधानी से कदम उठाना चाहिए ताकि हमारी मजबूत चिकित्सा शिक्षा प्रणाली द्वारा बनाए गए लाभ को नुकसान न पहुंचे.