चुनाव आयोग की स्वतंत्रता 'मूल ढांचे' का हिस्सा- SC
नई दिल्ली । डेस्क: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना संविधान के 'मूल ढांचे' (बेसिक स्ट्रक्चर) का अभिन्न अंग है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने जोर देकर कहा कि चुनाव आयोग का न केवल स्वतंत्र होना जरूरी है, बल्कि उसकी स्वतंत्रता जनता के बीच स्पष्ट रूप से दिखाई भी देनी चाहिए.
यह टिप्पणियां उस नई कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आईं, जो मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति की प्रक्रिया को नियंत्रित करता है.
विवाद की जड़ में 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यावधि) अधिनियम, 2023' है, जो 2 जनवरी, 2024 को लागू हुआ. इस कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक चयन समिति का प्रावधान है, जिसमें प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं.
याचिकाकर्ताओं का मुख्य विरोध इस बात पर है कि इस कानून ने चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को हटाकर एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया है, जिससे समिति में सरकार का बहुमत हो गया है. पीठ ने सरकार से सवाल किया कि समिति में किसी तीसरे निष्पक्ष व्यक्ति के बजाय कैबिनेट मंत्री को ही क्यों रखा गया है, ताकि नियुक्ति प्रक्रिया पर पूर्ण विश्वास बना रहे.
केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने इस कानून का पुरजोर बचाव किया. उन्होंने तर्क दिया कि संसद को कानून बनाने का पूर्ण अधिकार है और वह अनूप बरनवाल मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए 'अस्थायी' सुझावों को मानने के लिए बाध्य नहीं है. उन्होंने दलील दी कि किसी कानून को केवल काल्पनिक आशंकाओं के आधार पर रद्द नहीं किया जाना चाहिए.
उन्होंने एक कहावत का उपयोग करते हुए कहा, "पुडिंग कैसी है, यह उसे खाकर ही जाना जा सकता है." उनके अनुसार, जब तक चुनाव आयुक्तों के कामकाज में स्वतंत्रता की कमी दिखाई न दे, तब तक इस कानून को अवैध नहीं ठहराया जा सकता. उन्होंने अदालत को चेतावनी भी दी कि उसे 'विधायी क्षेत्र' में प्रवेश नहीं करना चाहिए और संसद के 'दूसरे सदन' की तरह कार्य करने से बचना चाहिए.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं में से एक, एनजीओ 'लोक प्रहरी' के प्रतिनिधि और पूर्व आईएएस अधिकारी एस.एन. शुक्ला ने इस कानून को 'संविधान के साथ धोखाधड़ी' करार दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने चयन प्रक्रिया को 'एकतरफा' बना दिया है, जहां विपक्ष के नेता की असहमति का कोई महत्व नहीं रह जाता.
हालांकि, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने शुक्ला की उन दलीलों पर असहमति जताई जिसमें उन्होंने मौजूदा आयुक्तों की योग्यता पर सवाल उठाए थे. जस्टिस शर्मा ने याद दिलाया कि ये सभी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी रहे हैं और उनके पास कलेक्टर तथा रिटर्निंग ऑफिसर के रूप में चुनाव कराने का व्यापक अनुभव है.
जैसे-जैसे बहस आगे बढ़ी, पीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे पांच जजों की संविधान पीठ के पास भेजने की संभावना पर भी विचार किया, क्योंकि इसमें अनुच्छेद 14 और 324 की व्याख्या से जुड़े कानून के महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल हैं.
हालांकि कुछ वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि मौजूदा पीठ ही फैसला लेने में सक्षम है, लेकिन अटॉर्नी जनरल ने बड़ी पीठ के विचार का समर्थन किया. फिलहाल इस मामले में सुनवाई अधूरी रही और सुप्रीम कोर्ट आने वाले दिनों में इस पर अपनी विस्तृत चर्चा जारी रखेगा, जिसका परिणाम भारतीय लोकतंत्र की चुनावी शुचिता के लिए दूरगामी प्रभाव वाला होगा.