चुनाव आयोग विवाद: CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ SC में सुनवाई अगले हफ्ते
नई दिल्ली । डेस्क: भारत के चुनाव आयोग (ECI) के भीतर शक्तियों के केंद्रीयकरण और फैसलों में पारदर्शिता को लेकर एक बड़ा संवैधानिक विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है. शीर्ष अदालत मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर उस याचिका पर अगले हफ्ते सुनवाई करने के लिए सहमत हो गई है, जिसमें उन पर अन्य दो चुनाव आयुक्तों को दरकिनार कर एकतरफा फैसले लेने का गंभीर आरोप लगाया गया है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने इस मामले का उल्लेख करते हुए तुरंत सुनवाई की मांग की. याचिका में कहा गया है कि संविधान और 2023 का नया कानून स्पष्ट रूप से चुनाव आयोग को एक बहु-सदस्यीय संस्था मानता है, जहां सभी फैसले सर्वसम्मति या फिर बहुमत से लिए जाने अनिवार्य हैं. इसके बावजूद मुख्य चुनाव आयुक्त ने आयोग की आड़ में व्यक्तिगत स्तर पर कई महत्वपूर्ण निर्णय लागू कर दिए.
बहुमत को दरकिनार करने का आरोप
फिलहाल चुनाव आयोग में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त हैं, जबकि सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी बतौर चुनाव आयुक्त तैनात हैं. याचिका के मुताबिक, पिछले कुछ महीनों के दौरान (28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच) दोनों चुनाव आयुक्तों ने कम से कम 14 अलग-अलग मुद्दों पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं. इन मामलों में आयोग की बिना मंजूरी के कदम उठाए गए थे.
मामले में 'को-वारंटो' (अधिकार पृच्छा) रिट जारी करने की मांग की गई है, जिसके जरिए मुख्य चुनाव आयुक्त से यह सवाल पूछा जाएगा कि वे किस अधिकार के तहत संविधान के अनुच्छेद 324 द्वारा प्रदत्त सामूहिक शक्तियों का अकेले इस्तेमाल कर रहे हैं.
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को रद्द करने की मांग
राकेश कुमार सिंह द्वारा दायर और अधिवक्ता मुदित गुप्ता के माध्यम से प्रस्तुत इस याचिका में आरोप लगाया गया है कि चुनाव आयोग के कामकाज में एजेंडे और मिनट्स को गायब या देर से जारी किया जा रहा है. सबसे बड़ा मुद्दा मतदाता सूची में बदलाव और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े फैसलों का है.
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यदि मतदाता सूची से जुड़े फैसले बिना बहुमत या कानूनी प्रक्रिया के लिए गए हैं, तो वे असंवैधानिक हैं. इसलिए कोर्ट से गुहार लगाई गई है कि 2023 अधिनियम की धारा 18 का उल्लंघन करके लिए गए सभी फैसलों और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की पूरी प्रक्रिया को शुरुआत से ही अवैध और प्रभावहीन घोषित किया जाए. अब सभी की निगाहें अगले हफ्ते सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं.