अनुकंपा नियुक्ति में बड़े बेटे का हक, छोटे भाई की नियुक्ति रद्द- HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अनुकंपा नियुक्ति के एक मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार के लागू परिपत्र के तहत बड़े बेटे के प्राथमिक अधिकार को बरकरार रखा है. कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी मृतक शासकीय सेवक के दो बेटे पात्र हैं, तो नियुक्ति के लिए विचार की पहली प्राथमिकता बड़े बेटे की ही होगी. प्रक्रिया का सही क्रम न अपनाए जाने के कारण हाई कोर्ट ने छोटे भाई को दी गई अनुकंपा नियुक्ति को निरस्त कर दिया है.
यह आदेश न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने 11 अगस्त 2026 को याचिकाकर्ता बड़े बेटे द्वारा 7 अगस्त 2019 के नियुक्ति आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर सुनाया.
क्या था पूरा मामला?
मुंगेली जिले के धरमपुरा स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में भृत्य (चपरासी) के पद पर कार्यरत ईश्वर सिंह क्षत्रिय का 29 सितंबर 2016 को सेवाकाल के दौरान निधन हो गया था. उनकी दो पत्नियां थीं. याचिकाकर्ता उनकी पहली पत्नी उषा बाई का बेटा है, जबकि मामले में प्रतिवादी चौथा व्यक्ति उनकी दूसरी पत्नी मिलौकिन बाई का बेटा है. सरकारी अभिलेखों में दूसरी पत्नी और उनके बच्चों को नामिति दर्ज किया गया था.
निधन के बाद उत्तराधिकार का मामला अदालत पहुंचा. शुरू में न्यायालय ने दूसरी पत्नी को छोड़कर प्रत्येक विधिक वारिस को 1/8वां हिस्सा दिया. बाद में जिला न्यायाधीश मुंगेली ने आदेश में संशोधन करते हुए सभी वारिसों को बराबर 1/8वां हिस्सा पाने का हकदार ठहराया.
बड़े बेटे का आवेदन क्यों हुआ था खारिज?
जब बड़े बेटे ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, तो जिला शिक्षा अधिकारी ने सितंबर 2018 में गुण-दोष पर विचार किए बिना उसका आवेदन इस आधार पर खारिज कर दिया कि उत्तराधिकार मामले में दूसरी पत्नी की अपील लंबित थी और उनकी सहमति प्राप्त नहीं थी. इसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने 7 अगस्त 2019 को छोटे बेटे को अनुकंपा नियुक्ति दे दी, जिसे बड़े बेटे ने हाई कोर्ट में चुनौती दी.
दूसरी शादी से जन्मे बच्चे का कानूनी अधिकार
उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम वी.आर. त्रिपाठी (2019)' और 'मुकेश कुमार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2022)' के फैसलों का संदर्भ दिया. सुप्रीम कोर्ट इन मामलों में पहले ही तय कर चुका है कि मृतक कर्मचारी की दूसरी शादी से जन्मी संतान भी वैध है और अनुकंपा नियुक्ति की हकदार है.
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने माना कि पहली पत्नी का बड़ा बेटा और दूसरी पत्नी का छोटा बेटा-दोनों ही अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र हैं. इसके बाद मुख्य प्रश्न यह था कि दोनों में से किसे प्राथमिकता दी जाए.
ज्येष्ठता के आधार पर मिलेगी प्राथमिकता
अदालत ने राज्य सरकार के 14 जून 2013 के परिपत्र (संशोधित 2016) का अध्ययन किया, जिसमें विधवा/विधुर के बाद पुत्र या दत्तक पुत्र को वरीयता क्रम में रखा गया है. चूंकि दोनों पत्नियों ने आवेदन नहीं किया था, इसलिए दोनों बेटे अगले पात्र वर्ग में आते थे. हालांकि, परिपत्र में एक ही वर्ग के दो बेटों के बीच प्राथमिकता तय करने का स्पष्ट नियम नहीं था.
इस कानूनी उलझन को दूर करने के लिए हाई कोर्ट ने पटना उच्च न्यायालय के 'राज किशोर कुमार बनाम बिहार राज्य (2009)' मामले के सिद्धांत को अपनाया, जिसमें माना गया था कि अनुकंपा नियुक्ति का विचार ज्येष्ठता (वरिष्ठता) के क्रम में किया जाना चाहिए. यानी बड़ा भाई पहला दावेदार होगा और उसका दावा खारिज होने पर ही छोटे भाई के नाम पर विचार किया जा सकता है.
हाई कोर्ट का अंतिम फैसला
न्यायमूर्ति अग्रवाल ने पटना हाई कोर्ट के दृष्टिकोण से सहमति जताते हुए छोटे बेटे को जारी 2019 के नियुक्ति आदेश को रद्द कर दिया. कोर्ट ने जिला शिक्षा अधिकारी मुंगेली को निर्देश दिया कि वे बड़े बेटे के मूल आवेदन की तिथि के अनुसार उसकी पात्रता की जांच करें और 30 दिनों के भीतर उसे सुनवाई का अवसर देते हुए नया आदेश जारी करें.