सोम, 19 अक्टू. 2026

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नेपाल के नए अध्यादेशों का भारी विरोध

शिक्षा सुधार या राजनीतिक कब्जा? नेपाल के नए अध्यादेशों का भारी विरोध

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11 मई 2026, 12:39 AM 5 मिनट में पढ़ें 2

बालेन्द्र शाह
बालेन्द्र शाह

काठमांडू । डेस्क: नेपाल में बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लाए गए नए सुधारों ने देश के बौद्धिक और राजनीतिक हलकों में एक भीषण विवाद को जन्म दे दिया है. शिक्षाविदों, प्रतिष्ठित प्रोफेसरों और नागरिक समाज के नेताओं ने सरकार के इन कदमों की कठोर निंदा करते हुए दावा किया है कि विश्वविद्यालय सुधार के नाम पर प्रधानमंत्री की पकड़ को शैक्षणिक संस्थानों पर और अधिक मजबूत किया जा रहा है.


आलोचकों का मानना है कि इन बदलावों से विश्वविद्यालयों में राजनीतिक हस्तक्षेप कम होने के बजाय और अधिक गहरा होगा.

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विवाद की मुख्य जड़ वे हालिया अध्यादेश हैं, जिनके माध्यम से सरकार ने एक झटके में 16 विश्वविद्यालयों के उप-कुलपति (VC), रेक्टर और रजिस्ट्रार के साथ-साथ कई स्वास्थ्य विज्ञान अकादमियों के वरिष्ठ अधिकारियों को उनके पदों से बर्खास्त कर दिया है.


सरकार का तर्क है कि ये परिवर्तन शैक्षणिक संस्थानों को दलीय प्रभाव से मुक्त करने और योग्यता-आधारित नियुक्तियों को सुनिश्चित करने के लिए 'अनिवार्य' थे. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इन अध्यादेशों ने सारी कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री के हाथों में केंद्रित कर दी है, जो पहले से ही विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति (चांसलर) के रूप में कार्य करते हैं.


ऐतिहासिक सुधारों की अनदेखी का आरोप


यह बहस नेपाल के विश्वविद्यालयों में राजनीतिक प्रभाव को लेकर लंबे समय से चली आ रही चिंताओं को फिर से जीवित कर गई है. वर्ष 2018 में 'उच्च स्तरीय राष्ट्रीय शिक्षा आयोग' ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट सिफारिश की थी कि प्रधानमंत्री को कुलाधिपति के पद से हटाया जाना चाहिए. आयोग का सुझाव था कि उनके स्थान पर शिक्षाविदों और विशेषज्ञों के नेतृत्व में एक 'बोर्ड ऑफ ट्रस्टी' प्रणाली लागू की जानी चाहिए. पूर्व शिक्षा मंत्री सुमना श्रेष्ठ और महाबीर पुन ने भी विश्वविद्यालय प्रशासन को राजनीतिक नेतृत्व से पूरी तरह अलग करने की वकालत की थी.


त्रिभुवन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और आयोग के सदस्य रहे शिक्षाविद विद्या नाथ कोइराला का कहना है कि सरकार ने सुधार के बजाय विपरीत दिशा में कदम बढ़ाए हैं. उनके अनुसार, प्रधानमंत्री को कुलाधिपति बनाना शुरू से ही एक त्रुटिपूर्ण विचार था और सरकार बदलते ही विश्वविद्यालय के शीर्ष अधिकारियों को हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है.

सीनेट के ढांचे में बदलाव और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का अंत


हालिया संशोधनों ने त्रिभुवन विश्वविद्यालय अधिनियम 1992 और अन्य संबंधित कानूनों की मूल भावना को बदल दिया है. नए अध्यादेशों के माध्यम से विश्वविद्यालय सीनेट से 'नेपाल प्राध्यापक संघ', 'शिक्षक संघ', 'कर्मचारी संघ' और 'स्वतंत्र विद्यार्थी संघ' (FSU) के संस्थागत प्रतिनिधित्व को समाप्त कर दिया गया है. पुरानी व्यवस्था में ये निर्वाचित संघ अपने प्रतिनिधियों को सीनेट में मनोनीत करते थे, जो प्रशासन पर नियंत्रण रखते थे.


अब नई व्यवस्था के तहत, प्रधानमंत्री बतौर कुलाधिपति स्वयं अपनी मर्जी से पांच शिक्षकों, दो छात्र प्रतिनिधियों और एक कर्मचारी प्रतिनिधि की नियुक्ति सीधे करेंगे. आलोचकों का कहना है कि इस बदलाव ने विश्वविद्यालयों के भीतर 'चेक एंड बैलेंस' (नियंत्रण और संतुलन) की व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया है. अब सीनेट में असहमति या बहस की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी, क्योंकि सभी सदस्य प्रधानमंत्री द्वारा सीधे तौर पर नियुक्त होंगे.


सरकार का बचाव और भविष्य की योजना


शिक्षा मंत्री सस्मित पोखरेल ने सरकार के इन फैसलों का बचाव करते हुए इन्हें 'साफ-सफाई' की प्रक्रिया बताया है. उन्होंने कहा कि ये सुधार शैक्षणिक संस्थानों को राजनीति से मुक्त करने की एक चरणबद्ध योजना का हिस्सा हैं. मंत्री के अनुसार, पहले चरण का लक्ष्य परिसरों से दलीय गुटबाजी को हटाना है, जबकि दूसरे चरण में प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री को कुलाधिपति और सह-कुलाधिपति के पदों से हटाने पर विचार किया जा सकता है. उन्होंने तर्क दिया कि इन पदों को तुरंत खाली करने से एक बड़ा 'संस्थागत शून्य' पैदा हो जाता, जिसे भरना वर्तमान परिस्थितियों में कठिन था.


नागरिक समाज और छात्र संगठनों का कड़ा विरोध


नागरिक समाज के नेताओं ने सरकार की इस कार्रवाई को 'शैक्षणिक अधिनायकवाद' करार दिया है. नीलांबर आचार्य और पीतांबर शर्मा जैसे प्रमुख हस्तियों ने एक संयुक्त बयान जारी कर कहा कि सुधार के नाम पर शैक्षणिक स्वतंत्रता का गला घोंटा जा रहा है. उन्होंने इसे पुरानी 'पजानी' प्रथा (जहाँ राजा अपनी इच्छा से अधिकारियों को हटाता था) की वापसी बताया.


नेपाल प्राध्यापक संघ के अध्यक्ष रमेश कुमार जोशी और शिक्षक संघ के अध्यक्ष बसंत ढकाल ने भी इन अध्यादेशों को शैक्षणिक स्वतंत्रता के ताबूत में आखिरी कील बताया है. छात्र संगठनों ने भी इसका कड़ा विरोध किया है


छात्र नेताओं का कहना है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को हटाकर प्रधानमंत्री द्वारा सीधे मनोनयन करना विश्वविद्यालयों के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया को दशकों पीछे ले जाने जैसा है.


नियुक्ति की नई प्रक्रिया और योग्यता के मापदंड


विरोध के बीच, सरकार ने संशोधित कानूनों के तहत आठ विश्वविद्यालयों में नए उप-कुलपतियों की नियुक्ति की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है. शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता वाली एक सिफारिश समिति ने आवेदन आमंत्रित किए हैं.


पहली बार उप-कुलपति पद के लिए पीएचडी की डिग्री, 10 साल का अनुभव और न्यूनतम 40 वर्ष की आयु जैसे कड़े मापदंड रखे गए हैं. उम्मीदवारों का मूल्यांकन उनके 'विज़न पेपर' और कार्य योजनाओं के आधार पर 100 अंकों के पैमाने पर किया जाएगा.


फिलहाल, नेपाल का उच्च शिक्षा क्षेत्र एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ सरकार इसे 'योग्यतावाद' का नाम दे रही है, जबकि अकादमिक जगत इसे 'राजनीतिक केंद्रीकरण' के रूप में देख रहा है. आने वाले समय में ये नियुक्तियां और विरोध प्रदर्शन तय करेंगे कि नेपाल के विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बरकरार रहती है या वे सत्ता के केंद्र का एक हिस्सा बनकर रह जाते हैं.


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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP