इकोनॉमिक सर्वे: 40% गिग वर्कर्स की कमाई 15,000 रुपये से कम
नई दिल्ली । डेस्क: संसद में गुरुवार को पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 ने देश की तेजी से बढ़ती गिग इकोनॉमी की एक चुनौतीपूर्ण तस्वीर पेश की है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लगभग 40 प्रतिशत गिग वर्कर्स हर महीने 15,000 रुपये से भी कम कमा पा रहे हैं.
सर्वेक्षण में इस बात पर चिंता जताई गई है कि आय में अस्थिरता और सामाजिक सुरक्षा के अभाव के कारण ये कर्मचारी वित्तीय रूप से हाशिए पर हैं. इस स्थिति को सुधारने के लिए सरकार ने अब प्रति-घंटा या प्रति-कार्य न्यूनतम आय तय करने और नवंबर 2025 में अधिसूचित नए श्रम कोड को तेजी से लागू करने की वकालत की है.
आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021 में गिग वर्कर्स की संख्या 77 लाख थी, जो वित्त वर्ष 2025 में 55 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी के साथ 1.2 करोड़ पहुंच गई है.
अनुमान है कि 2029-30 तक गैर-कृषि रोजगार में इनकी हिस्सेदारी 6.7 प्रतिशत हो जाएगी.
हालांकि, बढ़ती संख्या के बीच प्लेटफॉर्म कंपनियों के एल्गोरिदम और उनके बढ़ते वर्चस्व ने श्रमिकों के लिए तनाव पैदा कर दिया है.
सर्वे में चेतावनी दी गई है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म द्वारा काम के आवंटन और वेतन पर अत्यधिक नियंत्रण से श्रमिकों में 'बर्नआउट' और पक्षपात का खतरा बढ़ रहा है. इसी के मद्देनजर, हाल ही में क्विक कॉमर्स कंपनियों को उनके '10 मिनट डिलीवरी' जैसे विज्ञापनों को हटाने के निर्देश भी दिए गए थे.
सरकार का लक्ष्य अब केवल नौकरियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि काम की गुणवत्ता में सुधार करना है. इसके लिए ई-श्रम पोर्टल की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया है, जिस पर जनवरी 2026 तक 31 करोड़ से अधिक असंगठित श्रमिक पंजीकृत हो चुके हैं.
नए श्रम कोड के माध्यम से गिग वर्कर्स को औपचारिक पहचान, स्वास्थ्य लाभ और सामाजिक सुरक्षा कोष जैसी सुविधाएं देने की तैयारी है. इसके साथ ही, रिपोर्ट में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से होने वाले जॉब लॉस के डर को कम करने के लिए कौशल विकास और महिलाओं के लिए विशेष व्यावसायिक प्रशिक्षण पर भी जोर दिया गया है.