दुर्ग: जारी है अतिथि शिक्षकों का धरना, छाता लेकर रैली निकाली
दुर्ग । संवाददाता: छत्तीसगढ़ में अपने भविष्य और अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे 1000 से अधिक अतिथि शिक्षक अब आर-पार के मूड में आ गए हैं. दुर्ग स्थित हिंदी भवन के समक्ष बीते तीन हफ्तों से अपनी मांगों को लेकर डटे इन शिक्षकों का गुस्सा सोमवार को फूट पड़ा. तेज बारिश के बावजूद हाथ में छाते और शाम ढलते ही मोबाइल की फ्लैशलाइट जलाकर प्रदर्शनकारियों ने सीधे शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव के निवास का घेराव करने का प्रयास किया.
राज्य के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस संवेदनशील मामले पर सकारात्मक रुख अपनाते हुए उचित कदम उठाने का आश्वासन दिया है.
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे राज्य अतिथि शिक्षक संघ के मुख्य संरक्षक धर्मेंद्र दास वैष्णव ने अपनी व्यथा साझा करते हुए बताया कि पिछले 11 वर्षों से वे और उनके साथी कोंडागांव के केशकाल जैसे घने नक्सल प्रभावित और सुदूर आदिवासी अंचलों में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं.
उन्होंने कहा कि बंदूक की जगह बच्चों के हाथों में कलम थमाने वाले इन शिक्षकों को आज मात्र 20 हजार रुपये के मासिक मानदेय पर गुजारा करना पड़ रहा है. बढ़ती महंगाई में इस सीमित राशि से मकान किराया, बिजली बिल और परिवार के भरण-पोषण के साथ-साथ गंभीर बीमारियों का इलाज करा पाना पूरी तरह असंभव हो चुका है.
स्थिति इतनी दयनीय है कि कई बार शिक्षकों को अपने घर से पैसे मंगाने पड़ते हैं.
आंदोलनरत शिक्षकों का आरोप है कि सरकार आत्मानंद और विवेकानंद उत्कृष्ट विद्यालयों में कार्यरत अतिथि शिक्षकों को तो बेहतर वेतनमान और सुविधाएं मुहैया करा रही है, लेकिन वर्षों से विषम परिस्थितियों में सेवा दे रहे विद्यामितान शिक्षकों की सुध लेने वाला कोई नहीं है.
शिक्षक अब केवल खोखले आश्वासनों से संतुष्ट नहीं हैं. वे समान कार्य के लिए समान वेतन, सेवा सुरक्षा और संविलियन या समायोजन पर तत्काल ठोस नीतिगत निर्णय की मांग कर रहे हैं. इससे पूर्व अपनी पीड़ा जाहिर करने के लिए ये शिक्षक शिक्षा मंत्री को अपने खून से पत्र लिखकर इच्छामृत्यु तक की गुहार लगा चुके हैं.
दुर्ग दौरे पर पहुंचे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने विद्यामितान शिक्षकों के विषय पर बयान देते हुए कहा कि सरकार इस मामले का संज्ञान ले रही है और जो भी न्यायसंगत और उचित होगा, वही निर्णय लिया जाएगा. हालांकि, 20 दिनों का लंबा समय बीत जाने के बाद अब इन शिक्षकों का सब्र टूट रहा है और वे अपने सुरक्षित भविष्य का अधिकार पाकर ही राहत की सांस लेना चाहते हैं.