बिना ठोस कारण बताए बर्खास्तगी असंवैधानिक: छत्तीसगढ़ HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की बर्खास्तगी को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि सक्षम प्राधिकारी महज अपनी संतुष्टि के आधार पर संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत अनिवार्य विभागीय जांच को दरकिनार नहीं कर सकते. कोर्ट ने कहा कि अगर किसी कर्मचारी को बिना जांच के बर्खास्त किया जाता है, तो प्राधिकारी को इसके लिए लिखित में मजबूत और ठोस कारण दर्ज करने होंगे.
ऐसा न होने पर बर्खास्तगी का आदेश कानूनी रूप से वैध नहीं माना जाएगा.
यह फैसला जस्टिस बिभू दत्त गुरु की एकल पीठ ने एक शिक्षक की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया. याचिकाकर्ता को एक छात्रा को कथित तौर पर आपत्तिजनक व्हाट्सएप मैसेज भेजने और वीडियो कॉल करने के आरोपों में 7 फरवरी 2025 को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1966 के नियम 10 के तहत सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था.
शिक्षक ने कोर्ट में दलील दी थी कि उन्हें न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया, न कोई विभागीय जांच हुई और न ही उनका पक्ष सुना गया. दूसरी ओर, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि कदाचार की गंभीरता को देखते हुए सक्षम प्राधिकारी ने नियमों के तहत अपनी शक्तियों का सही इस्तेमाल किया है.
हाई कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए साफ किया कि बर्खास्तगी जैसी बड़ी सजा देने से पहले नियमानुसार विभागीय जांच जरूरी है. कोर्ट ने कहा कि केवल गंभीर आरोपों का हवाला देकर जांच से छूट नहीं दी जा सकती.
अनुच्छेद 311(2)(b) का अपवाद तभी लागू हो सकता है जब जांच न करने के कारण लिखित में दर्ज हों और वे कारण भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं.
अदालत ने पाया कि इस मामले में शिक्षक को हटाने के आदेश में जांच न कराने का कोई वैध कारण नहीं लिखा गया था, जो संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है.
अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि कोई जांच ही नहीं हुई, इसलिए वह आरोपों के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं कर रही है. कोर्ट ने बर्खास्तगी के आदेश को रद्द करते हुए प्रशासन को संवैधानिक नियमों के तहत आगे की कार्रवाई करने की छूट दी है.