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डिजिटल डेटा प्रोटेक्शन नियमों से पत्रकारिता पर संकट: एडिटर्स गिल्ड

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19 नव. 2025, 05:07 PM 5 मिनट में पढ़ें 1

Editors Gild of India
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नई दिल्ली । डेस्क: भारत के एडिटर्स गिल्ड ने भारत सरकार के हाल ही में अधिसूचित डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स 2025 पर गंभीर चिंता जताई है. गिल्ड का कहना है कि ये नियम पत्रकारिता को डेटा प्रोसेसिंग की श्रेणी में डाल सकते हैं, जिससे खबर इकट्ठा करने के काम के लिए भी व्यक्तिगत सहमति लेनी पड़ेगी. इससे जांच आधारित पत्रकारिता और जनहित की रिपोर्टिंग को गहरा नुकसान पहुंच सकता है. गिल्ड ने सरकार से तुरंत स्पष्टीकरण जारी करने और वास्तविक पत्रकारिता को कानून से छूट देने की मांग की है, ताकि प्रेस स्वतंत्रता और जनता के सूचना के अधिकार की रक्षा हो सके.


गिल्ड ने कहा कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023 के तहत लाए गए ये नियम कई अस्पष्टताओं से भरे हैं, जो न्यूजगेदरिंग, जांच रिपोर्टिंग और सामान्य संपादकीय प्रक्रियाओं को खतरे में डालते हैं. विशेष रूप से, ये नियम सूचना का अधिकार कानून को कमजोर करते हैं और पत्रकारिता के लिए कोई स्पष्ट छूट नहीं देते. गिल्ड ने याद दिलाया कि जुलाई 2025 में इलेक्ट्रॉनिक्स एंड आईटी मंत्रालय ने मीडिया संगठनों के साथ बैठक में मौखिक आश्वासन दिया था कि पत्रकारिता का काम इस कानून के दायरे में नहीं आएगा. लेकिन अब तक कोई लिखित स्पष्टीकरण नहीं आया है. उस बैठक में मीडिया समूहों ने सहमति की जरूरत, डेटा पहुंच, शोध और रिपोर्टिंग संबंधी छूट जैसे 35 सवाल उठाए थे, जो आज भी अनुत्तरित हैं.


गिल्ड ने चेतावनी दी कि अगर पत्रकारिता को डेटा प्रोसेसिंग माना गया, तो स्रोतों की गोपनीयता खतरे में पड़ जाएगी और सार्वजनिक हित की खोजबीन रुक सकती है. इसी बीच, डिगिपब न्यूज इंडिया फाउंडेशन ने भी मंगलवार को बयान जारी कर कहा कि ये नए नियम पत्रकारिता को खतरे में डालते हैं और भारत की पारदर्शिता व्यवस्था को कमजोर करते हैं. फाउंडेशन के अनुसार, डीपीडीपी एक्ट 2023 और डीपीडीपीआर 2025 मिलकर आरटीआई एक्ट को अपंगल बनाते हैं, जो लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए सबसे महत्वपूर्ण कानून है. साथ ही, ये एक ऐसा नियामक ढांचा तैयार करते हैं जो पत्रकारिता के लिए खतरा है.


Statement on the Notified Rules Under the Digital Personal Data Protection Act pic.twitter.com/wF9DqJANIS
— Editors Guild of India (@IndEditorsGuild) November 19, 2025


डिगिपब ने बताया कि नियमों में सहमति प्रबंधकों के लिए प्रक्रियाएं, डेटा संरक्षण की अवधि, बच्चों के डेटा प्रोसेसिंग, महत्वपूर्ण डेटा फिड्यूशरी की जिम्मेदारियां और राज्य के लिए व्यक्तिगत डेटा प्रोसेसिंग में छूट जैसी व्यवस्थाएं हैं. लेकिन ये सरकार को व्यापक पहुंच और प्रवर्तन शक्तियां देते हैं, बिना पत्रकारों के लिए कोई वैधानिक छूट दिए. फाउंडेशन ने कहा कि इससे स्रोत गोपनीयता प्रभावित होगी, जनहित जांच रुकेंगी, भ्रष्टाचार उजागर करने में बाधा आएगी और लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए जरूरी सूचना ढांचा कमजोर पड़ेगा. ये नियम राज्य के अनुपातहीन हस्तक्षेप और संपादकीय स्वतंत्रता में गुप्त दखल के रास्ते भी खोलते हैं.


डिगिपब ने एक्ट से पत्रकारिता छूट हटाने का पहले विरोध किया था. उन्होंने बताया कि सेक्शन 44(3) आरटीआई एक्ट के सेक्शन 8(1)(j) में बदलाव करता है, जो सार्वजनिक हित की प्राथमिकता को समाप्त कर सूचना पहुंच को और सीमित करता है. फाउंडेशन ने मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से लिखित में चिंताएं साझा कीं, बैठकें कीं और महत्वपूर्ण सवालों व आपत्तियों की संकलित सूची डाक से भेजी, लेकिन कोई जवाब नहीं आया. अगस्त में प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया को एक सरकारी स्रोत ने बताया था कि पत्रकारों और आरटीआई कार्यकर्ताओं की चिंताओं के समाधान के लिए जल्द एफएक्यू जारी होंगे, लेकिन वो भी अब तक नहीं आए. फाउंडेशन ने इसे लोकतांत्रिक परामर्श प्रक्रिया से विचलन और प्रेस स्वतंत्रता व संवैधानिक सूचना अधिकार की अवहेलना करार दिया.


DIGIPUB expresses its deep concern over the Digital Personal Data Protection Rules, 2025. pic.twitter.com/FEtsrSl0pg
— DIGIPUB News India Foundation (@DigipubIndia) November 18, 2025


नए कानून और नियम स्वतंत्र मीडिया पर अनुचित बोझ डालते हैं और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को गंभीर खतरा पैदा करते हैं. डिगिपब ने सरकार और आईटी मंत्रालय से सुधार प्रक्रिया शुरू करने, मीडिया समूहों द्वारा उठाई गई समस्याओं पर पारदर्शी और समयबद्ध परामर्श आरंभ करने तथा मीडिया स्वतंत्रता, सूचना पहुंच और डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र की अखंडता को कमजोर करने वाले प्रावधानों में संशोधन की अपील की. फाउंडेशन ने जोर दिया कि किसी भी लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रेस अपरिहार्य है.


15 नवंबर को अधिसूचित ये डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स 2025 आधुनिक डेटा संरक्षण ढांचे की अपेक्षित विशेषताओं से लैस हैं. इनमें डेटा उपयोग और भंडारण पर स्पष्ट सूचनाएं, अनिवार्य उल्लंघन प्रकटीकरण, नाबालिगों के लिए माता-पिता की सहमति, शिकायत निवारण की जिम्मेदारियां और डिजिटल डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की स्थापना शामिल है. नियम कंपनियों की जवाबदेही बढ़ाते हैं, जिसमें महत्वपूर्ण डेटा फिड्यूशरी के लिए सख्त ऑडिट, स्वास्थ्य और वित्त जैसे संवेदनशील क्षेत्रों के लिए बढ़ी जिम्मेदारियां और उल्लंघनों पर 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना है.


हालांकि, उद्योग संगठनों जैसे नास्कॉम और आईएएमएआई ने भारी प्रमाणीकरण और अनुपालन आवश्यकताओं पर चिंता जताई है, जिसमें वार्षिक डेटा प्रोटेक्शन प्रभाव मूल्यांकन और ऑडिट शामिल हैं, जो स्टार्टअप्स और छोटे उद्यमों पर बोझ डाल सकते हैं. सबसे विवादास्पद रूल 23 है, जो सरकार को नागरिक की सहमति के बिना किसी भी डेटा फिड्यूशरी से व्यक्तिगत डेटा मांगने की अनुमति देता है. आधार राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता, भारत की अखंडता, सार्वजनिक व्यवस्था या कानूनी कार्य हैं. कंपनियों को ऐसी मांगों के बारे में व्यक्तियों को सूचित करने से रोका गया है. उधर, एक्ट के सेक्शन 44(3) आरटीआई एक्ट में बदलाव कर लगभग सभी व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा रोकता है, जिससे नागरिकों के पास पारदर्शिता के कम रास्ते बचते हैं जबकि राज्य की पहुंच बढ़ जाती है.


नियम व्यक्तिगत डेटा पर नागरिक नियंत्रण का वादा करते हैं, लेकिन तत्काल प्रभाव में आने वाला एकमात्र प्रावधान राज्य की सत्ता विस्तार और सूचना पहुंच पर पाबंदी लगाने वाला है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP