धार भोजशाला को हाईकोर्ट ने कहा-यह देवी वाग्देवी का मंदिर
भोपाल | डेस्क: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार स्थित भोजशाला विवाद पर बड़ा फैसला सुनाते हुए इसे देवी वाग्देवी यानी मां सरस्वती का मंदिर माना है. इंदौर बेंच की डिवीजन बेंच ने कहा कि विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप “भोजशाला और देवी वाग्देवी सरस्वती के मंदिर” के रूप में स्थापित होता है. कोर्ट ने साथ ही हिंदू पक्ष को यहां पूजा का अधिकार दिया है, जबकि परिसर का संरक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पास ही रहेगा.
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने पांच याचिकाओं और तीन हस्तक्षेप आवेदनों पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्य और एएसआई की रिपोर्ट यह संकेत देते हैं कि यह स्थल संस्कृत शिक्षा का प्रमुख केंद्र और देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर रहा है.
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि तीर्थयात्रियों को सुविधाएं उपलब्ध कराना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना और देवता की पवित्रता की रक्षा करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है. अदालत ने यह भी माना कि समय के साथ यहां हिंदू पूजा की परंपरा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई.
कोर्ट ने यह भी कहा, "तीर्थयात्रियों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना, कानून व्यवस्था का उचित रखरखाव करना और देवता की पवित्रता और मूल स्वरूप को संरक्षित रखना एक संवैधानिक दायित्व है. हमने यह पाया है कि समय के साथ इस स्थल पर हिंदू पूजा की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई." "ऐतिहासिक साहित्य विवादित क्षेत्र के स्वरूप को संस्कृत शिक्षा के केंद्र के रूप में स्थापित करता है. साथ ही साहित्यिक और पुरातात्विक संदर्भ देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं."
अदालत ने कहा कि इस मामले में उन्होंने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों और अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है. कोर्ट ने कहा कि, "भारत सरकार और एएसआई धार ज़िले में स्थित भोजशाला मंदिर और संस्कृत शिक्षा से संबंधित मामलों के प्रशासन और प्रबंधन के उद्देश्य से निर्णय लेंगे. साथ ही एएसआई, 1958 के अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार संपत्ति का समग्र प्रशासन और प्रबंधन जारी रखेगा."
अपने फैसले में अदालत ने कहा- "जहां तक याचिकाकर्ताओं द्वारा देवी सरस्वती की प्रतिमा को लंदन म्यूज़ियम से वापस लाकर भोजशाला परिसर में दोबारा स्थापित करने की मांग है उसमें याचिकाओं के याचिकाकर्ता पहले ही भारत सरकार को कई रिप्रेज़ेंटेशन दे चुके हैं. भारत सरकार लंदन म्यूज़ियम से देवी सरस्वती की प्रतिमा वापस लाने और उसे परिसर में पुनः स्थापित करने के संबंध में इन रिप्रेज़ेंटेशन पर विचार कर सकती है."
मुस्लिम समाज को लेकर अदालत ने कहा- "मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों की सुरक्षा और पक्षकारों के बीच पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के उद्देश्य से, अगर प्रतिवादी (मुस्लिम पक्ष) धार ज़िले में मस्जिद या नमाज़ के स्थान के निर्माण के लिए उपयुक्त भूमि आवंटन हेतु आवेदन प्रस्तुत करता है, तो राज्य सरकार कानून के अनुसार उस आवेदन पर विचार कर सकती है और मुस्लिम समुदाय को धार ज़िले में उपयुक्त एवं स्थायी भूमि आवंटित कर सकती है."
बरसों पुराना विवाद
भोजशाला परिसर लंबे समय से विवाद का केंद्र रहा है. हिंदू पक्ष इसे मां वाग्देवी का मंदिर और प्राचीन शिक्षा केंद्र बताता रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद मानता है. वर्ष 2003 से लागू व्यवस्था के तहत मंगलवार को हिंदू पक्ष को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी जाती रही है. बाकी दिनों में परिसर पर्यटकों के लिए खुला रहता है.
मामले ने 2022 में नया मोड़ लिया, जब हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस समेत अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर भोजशाला के धार्मिक स्वरूप के निर्धारण, नियमित पूजा की अनुमति और नमाज पर रोक की मांग की. इसके बाद हाईकोर्ट ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण का आदेश दिया था. एएसआई ने 2024 में 98 दिनों तक परिसर का सर्वे किया.
मुस्लिम पक्ष से जुड़ी मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी ने इस सर्वे को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सर्वे पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन रिपोर्ट को सीलबंद न रखने और पक्षकारों को उसकी प्रतियां देने के निर्देश दिए थे.
सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि परिसर लंबे समय से कमाल मौला मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होता रहा है और धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है. वहीं हिंदू पक्ष ने शिलालेखों, स्थापत्य अवशेषों, ऐतिहासिक दस्तावेजों और वसंत पंचमी पर पूजा की परंपरा का हवाला देकर इसे मंदिर बताया
मामले में जैन पक्ष ने भी हस्तक्षेप किया था. जैन समुदाय के याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि परिसर की स्थापत्य शैली राजस्थान के दिलवाड़ा जैन मंदिरों से मेल खाती है.
फैसले के बाद हिंदू पक्ष के अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने कहा कि अदालत ने एएसआई रिपोर्ट, ऐतिहासिक गजेटियर और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर निर्णय दिया है. उन्होंने कहा कि इमारत की संरचना मंदिर की विशेषताओं को दर्शाती है और इसी आधार पर पक्ष रखा गया था.
वहीं मुस्लिम पक्ष के वकील अशहर वारसी ने फैसले पर असहमति जताई. उन्होंने कहा कि वे पूरे आदेश का अध्ययन करेंगे और जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे. वारसी ने कहा कि एएसआई सर्वेक्षण की प्रक्रिया और निष्कर्षों को भी चुनौती दी जाएगी.
फैसले के बाद धार और इंदौर में प्रशासन अलर्ट पर है. दोनों शहरों में सुरक्षा व्यवस्था बढ़ा दी गई है और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की गई है.