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HC: गरीबों को मुफ्त कानूनी सहायता न देना मौलिक अधिकार का उल्लंघन

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07 जन. 2026, 09:37 PM 2 मिनट में पढ़ें 1

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पारिवारिक विवादों में न्याय की पहुंच को लेकर एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है. न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल और न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल की खंडपीठ ने एक पारिवारिक अदालत द्वारा पारित तलाक की डिक्री को इस आधार पर रद्द कर दिया कि अदालत ने महिला की मुफ्त कानूनी सहायता की मौखिक प्रार्थना को नजरअंदाज कर दिया था. 


हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि गरीब और कमजोर पक्षकारों को प्रभावी कानूनी सहायता प्रदान करना केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उनके मौलिक अधिकार का हिस्सा है.


मामले के अनुसार, एक महिला ने पारिवारिक अदालत में अपनी आर्थिक तंगी का हवाला देते हुए वकील करने में असमर्थता जताई थी. इसके बावजूद, अदालत ने उसे विधिक सहायता उपलब्ध कराए बिना ही एकतरफा (ex-parte) कार्यवाही की और तलाक की डिक्री पारित कर दी. 


इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि पारिवारिक अदालतों का उद्देश्य केवल विवाद सुलझाना नहीं, बल्कि महिलाओं और बच्चों जैसे कमजोर वर्गों के लिए 'वास्तविक न्याय' सुनिश्चित करना है. 


कोर्ट ने कहा कि महज जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के पास जाने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है; अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पक्षकार को वास्तव में वकील की सेवाएं मिली हैं या नहीं.


अदालत ने राज्य की सभी पारिवारिक अदालतों को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे छत्तीसगढ़ परिवार न्यायालय नियम, 2007 के तहत 'एमिकस क्यूरी' (न्याय मित्र) या कानूनी विशेषज्ञों का अपना एक अलग पैनल तैयार करें. 


हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि कोई पक्षकार वकील करने में असमर्थ है, तो अदालत को स्वयं अपने पैनल से वकील नियुक्त करना चाहिए, न कि केवल डीएलएसए पर निर्भर रहना चाहिए. इन वकीलों का शुल्क राज्य सरकार वहन करेगी. 


अदालत ने वर्तमान मामले को नवंबर 2023 की स्थिति से पुनः शुरू करने और महिला को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने का आदेश दिया है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP