सदन बहाली की मांग 'अस्थिरता' लाएगी, चुनाव बहिष्कार 'अराजकता'- नेपाल PM कार्की
काठमांडू । डेस्क: नेपाल की प्रधानमंत्री सुशीला कार्की ने भंग प्रतिनिधि सभा की बहाली और अंतरिम सरकार की वैधता पर सवाल उठाने की मांगों को लेकर कड़ी चेतावनी दी है. प्रधानमंत्री कार्की ने कहा है कि ऐसे कदम देश को अस्थिरता के एक नए चक्र में धकेल सकते हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि 5 मार्च को होने वाले चुनावों का बहिष्कार करने वाले किसी भी राजनीतिक दल को 'अराजकता' का विकल्प चुनने वाला माना जाएगा.
प्रधानमंत्री का यह बयान तब आया है जब भंग निचले सदन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी, सीपीएन-यूएमएल (CPN-UML) ने सदन भंग करने के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का फ़ैसला किया है. सीपीएन-यूएमएल के प्रमुख केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली पिछली सरकार को 9 सितंबर को 'जेन ज़ी' आंदोलन द्वारा सत्ता से हटाए जाने के बाद, पूर्व मुख्य न्यायाधीश कार्की को 12 सितंबर को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था.
उसी दिन, राष्ट्रपति रामचन्द्र पौडेल ने उनकी सिफारिश पर प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया था. ओली सरकार के दौरान भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ विरोध कर रहे निहत्थे युवाओं पर क्रूर बल प्रयोग में कम से कम 76 लोग मारे गए थे.
निर्वाचन आयोग में पंजीकृत राजनीतिक दलों की एक बैठक को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि सदन की बहाली की मांग लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करेगी और अस्थिरता को बढ़ाएगी. उन्होंने चुनावों के लिए सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया और पार्टियों से रचनात्मक रूप से चुनावी प्रक्रिया में शामिल होने का आग्रह किया.
प्रधानमंत्री कार्की ने जोर देकर कहा कि यदि कोई पार्टी निर्वाचन आयोग में पंजीकरण कराने में विफल रहती है या चुनावों का बहिष्कार करना चुनती है, तो उसे लोकतंत्र की रक्षा के बजाय अराजकता का मार्ग चुनने वाला माना जाएगा. उन्होंने पार्टियों से 26 नवंबर तक पंजीकरण कराने का आग्रह किया, यह इस बात पर ज़ोर देते हुए कि आगामी चुनावों में भाग लेने के लिए यह एक अनिवार्य कदम है.
उन्होंने आगे कहा, "चुनावों की घोषणा के बाद भी, कुछ पार्टियां अनिश्चितता दिखा रही हैं और किनारे पर बनी हुई हैं. प्रतिनिधि सभा की बहाली की मांग और सरकार की वैधता पर सवाल उठाना देश को अस्थिरता के चक्र में वापस ले जा सकता है." उन्होंने साफ किया कि 5 मार्च को प्रतिनिधि सभा का चुनाव कराना सरकार का संवैधानिक कर्तव्य और अटूट राजनीतिक प्रतिबद्धता है.
प्रधानमंत्री ने राजनीतिक दलों से एक संवैधानिक समाधान की ओर बढ़ने का आग्रह किया और चेतावनी दी कि भंग सदन की बहाली की मांग पिछली राजनीतिक आपदाओं को दोहराने का प्रयास होगा. उन्होंने कहा कि अब हमें राजनीतिक बहस को संवैधानिक रास्ते-यानी चुनाव- पर केंद्रित करना चाहिए.
सुरक्षा और सुशासन को सरकार की मुख्य प्राथमिकता बताते हुए, प्रधानमंत्री ने चुनाव खर्च कम करने और संसाधनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए ठोस कदमों की भी घोषणा की. उन्होंने कहा कि चुनावी अभियान के लिए पार्टियों को केवल 21 दिन मिलेंगे, जो चुनावों में पारदर्शिता और मितव्ययिता लाएगा.
प्रधानमंत्री कार्की ने युवा विद्रोह का सम्मान करते हुए कहा कि यह दलालों, भ्रष्ट और माफिया को संरक्षण देने की प्रवृत्ति को समाप्त करने की मांग है, जिसे सरकार पूरी तरह से सम्मान करती है. उन्होंने कहा, "हम युवाओं के गुस्से को मतपत्र की सकारात्मक ऊर्जा में बदलना चाहते हैं." उन्होंने बताया कि चुनावी प्रक्रिया में युवाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए अध्यादेश के माध्यम से चुनाव कानून में सुधार किए जा रहे हैं.
सरकार ने यह भी आश्वासन दिया कि जेन ज़ी विद्रोह के दौरान हुई हिंसक घटनाओं की निष्पक्ष और त्वरित जांच की जा रही है और दोषियों को सज़ा दी जाएगी.