बुजुर्गों में इम्यूनिटी की गिरती ताकत: संक्रमण रोकने का उपाय
कोलकाता । डेस्क: आधुनिक जीवनशैली की तेज रफ्तार ने स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे दिया है. लंबे काम के घंटे, बैठे-बैठे जीवन, अस्वास्थ्यकर खान-पान, तनाव और प्रदूषण ने जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के साथ-साथ संक्रामक रोगों को भी बढ़ावा दिया है. नतीजतन, डॉक्टरों और अस्पतालों के चक्कर कटने की संख्या कभी न देखी गई. लेकिन क्या होगा अगर बीमारियां ही रोक ली जाएं, तो इलाज की जरूरत ही न पड़े?
अनंदबाजार डॉट कॉम को दिए हालिया इंटरव्यू में अपोलो मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल्स के सीनियर कंसल्टेंट, जनरल फिजिशियन और इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट डॉ. नारायण बंदोपाध्याय ने प्रिवेंटिव मेडिसिन पर जोर देते हुए कहा, "प्रिवेंटिव हेल्थकेयर पर हर पहलू में ध्यान देना चाहिए. विदेशों में यह हर स्तर पर प्राथमिकता है, लेकिन भारत में संक्रामक रोग अभी भी बहुत प्रचलित हैं. वर्तमान में अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों का लगभग 30 से 40 प्रतिशत हिस्सा छाती के संक्रमणों से जुड़ा है."
डॉ. बंदोपाध्याय ने बताया कि बुजुर्ग इस संक्रमण का सबसे ज्यादा शिकार होते हैं. उन्होंने स्पष्ट किया, "जैसे ही लोग 50 वर्ष की उम्र पार करते हैं, उनकी सेलुलर इम्यूनिटी कमजोर होने लगती है. टीकाकरण से उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाना जरूरी हो जाता है."
बच्चों के लिए जन्म से 12 वर्ष की उम्र तक टीकाकरण अनिवार्य है, लेकिन वयस्कों के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण है. डॉक्टर ने सलाह दी कि सर्विकल कैंसर रोकने वाले टीके लगवाए जाने चाहिए. 50 वर्ष की उम्र से हर साल इन्फ्लुएंजा (फ्लू) का टीका अनिवार्य है. इसके अलावा, न्यूमोनिया से बचाव के लिए भी टीकाकरण जरूरी है.
बुजुर्गों के लिए अन्य जरूरी टीकों के बारे में पूछे जाने पर डॉ. बंदोपाध्याय ने कहा, "टेटनस का टीका अनिवार्य है और इसे हर 10 वर्ष में दोहराना चाहिए. साथ ही, हर्पीस जोस्टर का टीका दो खुराकों में लिया जाना चाहिए. उम्र के अनुसार Tdap टीका भी लगवाना चाहिए."
संक्रमणों से बचाव के लिए केवल टीकाकरण ही काफी नहीं. डॉक्टर ने जोर देकर कहा कि संतुलित आहार अपनाना, धूम्रपान और शराब से परहेज करना तथा सभी टीके समय पर लगवाना आवश्यक है. प्रिवेंटिव मेडिसिन को अपनाकर न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य सुरक्षित किया जा सकता है, बल्कि स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ भी कम हो सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत में विदेशी मॉडल की तरह प्रिवेंटिव हेल्थकेयर को बढ़ावा दिया जाए, तो संक्रामक रोगों की यह महामारी जैसी स्थिति नियंत्रित हो सकती है.