RSS की तुलना 'कू क्लक्स क्लान' से करना गलत- दत्तात्रेय होसबोले
नई दिल्ली । डेस्क: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने अमेरिका के हडसन इंस्टीट्यूट में आयोजित 'न्यू इंडिया कॉन्फ्रेंस' के दौरान संघ को लेकर बनी गलत धारणाओं पर विस्तार से अपनी बात रखी. उन्होंने स्पष्ट रूप से उन दावों को खारिज कर दिया जिसमें आरएसएस की तुलना अमेरिकी श्वेत वर्चस्ववादी समूह 'कू क्लक्स क्लान' (KKK) से की जाती है.
होसबोले ने कहा कि संघ के खिलाफ दशकों से एक ऐसा नैरेटिव तैयार किया गया है जो उसे अल्पसंख्यक विरोधी या वर्चस्ववादी बताता है, जबकि हकीकत इसके उलट है.
होसबोले ने हिंदू दर्शन का हवाला देते हुए कहा कि हिंदू संस्कृति पूरे विश्व को एक परिवार (वसुधैव कुटुंबकम) के रूप में देखती है, जहाँ वर्चस्ववाद के लिए कोई स्थान नहीं है.
उन्होंने जोर देकर कहा कि इतिहास गवाह है कि हिंदुओं ने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया.
आरएसएस को एक स्वयंसेवी आंदोलन बताते हुए उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य चरित्र निर्माण, आत्मविश्वास और समाज सेवा की भावना पैदा करना है.
वर्तमान में संघ देश भर में लगभग 83,000 शाखाएं चला रहा है, जो शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में सक्रिय हैं. आधुनिकीकरण और सांस्कृतिक मूल्यों के संतुलन पर बात करते हुए उन्होंने जापान और चीन का उदाहरण दिया और कहा कि परंपराएं आधुनिकता के साथ सफलतापूर्वक सह-अस्तित्व में रह सकती हैं.
गौरतलब है कि कू क्लक्स क्लान (KKK), जिसे संक्षेप में 'क्लान' भी कहा जाता है, अमेरिका का एक दक्षिणपंथी (extreme right-wing) गुप्त संगठन है जो मुख्य रूप से श्वेत वर्चस्ववाद (White Supremacy) और नस्लवाद की विचारधारा पर आधारित है. इसकी स्थापना 24 दिसंबर, 1865 को अमेरिकी गृहयुद्ध के बाद टेनेसी के पुलास्की में छह पूर्व सैनिकों द्वारा की गई थी.
शुरुआत में यह एक सामाजिक क्लब के रूप में बना था, लेकिन जल्द ही यह एक हिंसक संगठन में बदल गया, जिसका मुख्य उद्देश्य दक्षिण में पूर्व गुलामों (अफ्रीकी-अमेरिकियों) को उनके नए मिले नागरिक अधिकारों और राजनीतिक शक्ति से वंचित करना था.
यह संगठन अपने विशिष्ट प्रतीकों के लिए कुख्यात है, जिसमें सदस्य सफेद चोगे, मुखौटे और शंक्वाकार टोपियां पहनते हैं ताकि उनकी पहचान गुप्त रहे. जलता हुआ क्रूस इनका एक प्रमुख और डरावना प्रतीक रहा है.
इतिहास में क्लान के तीन अलग-अलग दौर देखे गए हैं. पहला दौर 1860 के दशक में था, दूसरा 1920 के दशक में जिसमें इसकी सदस्यता लाखों में पहुँच गई थी, और तीसरा दौर 1950-60 के दशक के नागरिक अधिकार आंदोलन के दौरान सक्रिय हुआ.
केकेके ने अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हत्या, मारपीट, आगजनी और डराने-धमकाने जैसी हिंसक और आतंकवादी गतिविधियों का सहारा लिया है. आधुनिक समय में, यह कई छोटे और अलग-अलग समूहों में विभाजित हो चुका है, जिन्हें मानवाधिकार संगठनों द्वारा 'घृणा समूह' की श्रेणी में रखा गया है.