उत्तर कोरिया और रूस के बीच रक्षा समझौते की आहट से चीन बेचैन
हांगकांग । डेस्क: रूस और उत्तर कोरिया के बीच तेजी से गहराते सैन्य संबंधों ने वैश्विक कूटनीति में नई हलचल पैदा कर दी है. हाल ही में रूसी रक्षा मंत्री एंड्रे बेलौसोव की प्योंगयांग यात्रा के दौरान एक अभूतपूर्व पांच वर्षीय रक्षा सहयोग योजना (2027-2031) का प्रस्ताव सामने आया है, जिसने बीजिंग की माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता न केवल उत्तर कोरिया के सैन्य आधुनिकीकरण को गति देगा, बल्कि इस क्षेत्र में चीन के पारंपरिक प्रभाव को भी चुनौती दे सकता है. बेलौसोव ने किम जोंग-उन के साथ मुलाकात में द्विपक्षीय संबंधों को "अभूतपूर्व उच्च स्तर" पर बताया और संकेत दिया कि इस साल के अंत तक एक दीर्घकालिक सैन्य रोडमैप पर हस्ताक्षर किए जा सकते हैं.
यह योजना 2024 में हस्ताक्षरित 'व्यापक रणनीतिक साझेदारी संधि' का विस्तार मानी जा रही है, जिसमें पहले से ही आपसी रक्षा का प्रावधान शामिल है.
विश्लेषकों के अनुसार, रूस आमतौर पर इस तरह के दीर्घकालिक सैन्य नियोजन केवल अपने सबसे करीबी सहयोगियों जैसे बेलारूस या बड़े रक्षा भागीदारों के साथ ही करता है. यदि यह योजना अमल में आती है, तो उत्तर कोरिया रूस के लिए एक "पूर्वी चौकी" की तरह कार्य करेगा, जो दक्षिण कोरिया, अमेरिका और जापान के त्रिपक्षीय गठबंधन का मुकाबला करने में मॉस्को की मदद करेगा.
इस सहयोग के तहत रूस द्वारा उत्तर कोरिया को उपग्रह, परमाणु पनडुब्बी और अगली पीढ़ी की मिसाइल तकनीक हस्तांतरित करने की संभावना है. इसके बदले में, उत्तर कोरिया न केवल यूक्रेन युद्ध के लिए हथियार और गोला-बारूद की आपूर्ति कर रहा है, बल्कि वहां अपने सैनिकों की तैनाती भी कर चुका है.
दक्षिण कोरियाई खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, अब तक लगभग 15,000 उत्तर कोरियाई सैनिक यूक्रेन भेजे जा चुके हैं, जिनमें से बड़ी संख्या में हताहत भी हुए हैं.
चीन के लिए यह स्थिति बेहद जटिल है. एक तरफ जहां बीजिंग रूस और उत्तर कोरिया की नजदीकी को अमेरिका पर दबाव बनाने के एक 'रणनीतिक साधन' के रूप में देखता है, वहीं दूसरी ओर उसे डर है कि प्योंगयांग पर उसका नियंत्रण कम हो जाएगा. यदि उत्तर कोरिया सैन्य और आर्थिक रूप से सीधे रूस पर निर्भर हो जाता है, तो चीन के पास उसे प्रभावित करने के लिए बहुत कम रास्ते बचेंगे.
इसके अतिरिक्त, उत्तर कोरिया की बढ़ती सैन्य शक्ति क्षेत्र में "अनियंत्रित जोखिम" पैदा कर सकती है, जो चीन की स्थिरता के लिए खतरा है. थिंक-टैंक विशेषज्ञों का कहना है कि यह विकासक्रम बीजिंग को दरकिनार करने जैसा है, जिससे उसे कोरियाई प्रायद्वीप के घटनाक्रमों पर कम प्रभाव मिलेगा.
राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस स्थिति का उपयोग आगामी अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में एक सौदेबाजी के चिप के रूप में कर सकते हैं, लेकिन आंतरिक रूप से मॉस्को और प्योंगयांग की यह 'जुगलबंदी' चीन की दीर्घकालिक क्षेत्रीय रणनीति के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है. इस संभावित रक्षा सौदे ने स्पष्ट कर दिया है कि रूस अब उत्तर कोरिया को केवल एक साथी नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण रणनीतिक आधार के रूप में देख रहा है.