क्या बसंत पंडो 73 साल बाद राष्ट्रपति से फिर मिल पायेंगे ?
रायपुर । संवाददाता: क्या बसंत पंडो 73 साल बाद देश के राष्ट्रपति से फिर मिल पायेंगे? यह सवाल सरगुजा की धरती पर गूंज रही है. बसंत पंडो जब 6 साल के थे तब 1952 में वे देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से सूरजपुर में मिले थे. उस समय 6 वर्ष के बालक का नाम 'गोलू' था. राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद जी ने ही उसको गोद में उठाकर उसका नामकरण किया था, ‘बसंत’.
आज वही, बसंत 80 साल के हो गये हैं. एक बार फिर भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू 20 नवंबर को अंबिकापुर पहुंचने वाली हैं. राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मू के इस प्रवास से पूरे जनजातीय समाज में उत्साह का महौल है. उम्मीद की जा रही है कि बसंत पंडो उनसे मिल पायेंगे तथा पुरानी यादों को फिर से ताजा करेंगे.
वर्तमान राष्ट्रपति के इस आगमन से पंडो समाज के बसंत पंडो को उनसे मिलने की आस जगी है. वे राष्ट्रपति श्रीमति मुर्मू से मिलकर प्रथम राष्ट्रपति से मिलने की अपने संजोए हुए स्मृतियों को साझा करना चाहते हैं.
वे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलकर न सिर्फ पंडो समाज की प्रमुख मुद्दों को बताना चाहते हैं, बल्कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद से जुड़े अपने उस अनमोल अनुभव को भी साझा करना चाहते हैं, जिसे वे आज तक अपने दिल में संजोए हुए हैं.
उल्लेखनीय है कि सूरजपुर में जहां देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद रुके थे, उसे ‘राष्ट्रपति भवन’ के रूप में जाना जाता है. पंडो समाज को विश्वास है कि बसंत की यह मुलाकात उनके समुदाय के लिए नए बदलाव की शुरुआत बनेगी. यह भी उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से जनजातीय समाज प्रमुखों के भी मिलने का कार्यक्रत प्रस्तावित है.
गौरतलब है कि सरगुजा का पंडो समाज खुद को महाभारत काल के पांडवों से जोड़ता है और खुद को उनका वंशज मानता है. इनका इतिहास जंगल से जुड़ा रहा है, जहाँ वे प्रकृति पर निर्भर थे और लाह, लठी व कुसा जैसी वस्तुएँ इकट्ठा कर बेचते थे. प्रचलित किवदंतियों के अनुसार पाण्डव वनवास के दौरान भोजन की पूर्ति के लिए बेवरा कृषि करने लगे. खेत से पक्षियों को दूर रखने के लिए काग-भगौड़ा (पुतला) बनाकर खेत में खड़ा किया गया.
छत्तीसगढ़ राज्य की विशेष पिछड़ी जनजातियों में पंडो जनजाति का नाम प्रमुखता से आता है. यह जनजाति राज्य के दूर-दराज इलाकों में निवास करती है, जहां मूलभूत सुविधाओं का अभाव और शासन की योजनाओं तक पहुंच की समस्या लंबे समय से बनी हुई थी.
वर्तमान में पंडो नगर में बिजली, पानी और स्कूल जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं, जो एक दूरस्थ वन निवास से एक गांव में विकसित होने का संकेत देता है. पंडो समाज में घर में दो दरवाजे बनाने की अनोखी परंपरा है. एक सामान्य उपयोग के लिए होता है, जबकि दूसरा मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के लिए आरक्षित होता है.
यदि किसी घर में बार-बार मृत्यु होती है, तो उसे "फल न देने वाला घर" माना जाता है. ऐसे में परिवार के लोग वह घर छोड़ देते हैं और नया घर बना लेते हैं. यह समाज बांस से टोकरियां, सूपे और अन्य घरेलू सामान बनाने में निपुण है.
पंडो जनजाति छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिला के अंबिकापुर, लखनपुर, उदयपुर, सूरजपुर, भैय्याथान, ओडगी, रामानुजनगर, प्रेम नगर, प्रतापपुर, वाड्रफनगर तथा बलरामपुर जिले में निवासरत हैं.