छत्तीसगढ़ कुष्ठ रोग में देश में सबसे आगे
छत्तीसगढ़ कुष्ठ रोग में अग्रणी क्यों ?
रायपुर | आयुषी शर्मा : छत्तीसगढ़ एक बार फिर देश की स्वास्थ्य चिंताओं के केंद्र में है, और इस बार मुद्दा है कुष्ठ रोग का. मार्च 2025 तक के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि राज्य में प्रति 10,000 जनसंख्या पर 1.80 कुष्ठ रोगी दर्ज किए गए हैं. यह दर भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे अधिक है.
यह स्थिति तब है, जब देश के स्तर पर कुष्ठ रोग नियंत्रण की कहानी अक्सर एक सफलता मॉडल के रूप में पेश की जाती रही है. भारत ने राष्ट्रीय स्तर पर कुष्ठ रोग उन्मूलन, प्रति 10,000 आबादी पर 1 से कम प्रचलन दर की स्थिति बनाए रखी है, लेकिन राज्यवार आंकड़े साफ बताते हैं कि छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों में यह लड़ाई अभी भी अधूरी है.
देश में सबसे कम कुष्ठ रोग त्रिपुरा (0.02), मेघालय (0.03), मणिपुर (0.05) और जम्मू-कश्मीर (0.07) में दर्ज किए गए हैं. इनके बाद पुदुचेरी, केरल और नागालैंड में यह दर प्रति 10,000 पर 0.11 है. यानी जिन राज्यों में प्रचलन दर सबसे कम है, वहाँ हर 5 लाख या 10 लाख की आबादी में मुश्किल से कुछ दर्जन मरीज दिखते हैं, जबकि छत्तीसगढ़ में वही बीमारी हर 10,000 पर 1.80 की दर से मौजूद है.
मार्च 2025 तक देश के 31 राज्य और 638 जिले प्रति 10,000 जनसंख्या पर 1 से कम प्रचलन दर हासिल कर चुके हैं. इसका मतलब यह है कि भारत ने कागज़ी तौर पर राष्ट्रीय स्तर पर कुष्ठ रोग उन्मूलन का लक्ष्य तो कायम रखा है, लेकिन छत्तीसगढ़, झारखंड, चंडीगढ़ और महाराष्ट्र जैसे चार राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में अभी भी प्रति 10,000 पर 1 से अधिक कुष्ठ रोगी हैं.
छत्तीसगढ़ के बाद झारखंड में यह दर 1.46, चंडीगढ़ में 1.35 और महाराष्ट्र में 1.12 है. ये चारों मिलकर देश के उन क्षेत्रों की श्रेणी में आते हैं, जहाँ कुष्ठ रोग न सिर्फ मौजूद है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के लिए चुनौती के रूप में कायम है.
अन्य राज्यों के आँकड़े यह तस्वीर और साफ कर देते हैं- आंध्र प्रदेश 0.46, अरुणाचल प्रदेश 0.15, असम 0.26, बिहार 0.85, गोवा 0.45, गुजरात 0.38, हरियाणा 0.13, हिमाचल प्रदेश 0.14, कर्नाटक 0.27, मध्य प्रदेश 0.82, ओडिशा 1.37, पंजाब 0.14, राजस्थान 0.14, सिक्किम 0.17, तमिलनाडु 0.26, तेलंगाना 0.46, उत्तर प्रदेश 0.37, उत्तराखंड 0.22, पश्चिम बंगाल 0.46, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह 0.19, डीडी एवं डीएनएच 0.63, दिल्ली 0.71, लक्षद्वीप 0.14 और लद्दाख 0.33 प्रति 10,000 जनसंख्या पर. इसमें स्पष्ट दिखता है कि छत्तीसगढ़ और कुछ चुनिंदा राज्यों को छोड़ दें, तो अधिकांश हिस्सों में कुष्ठ रोग का बोझ अपेक्षाकृत कम हो चुका है.
भारी बोझ से उन्मूलन की ओर
कुष्ठ रोग नियंत्रण में भारत की यात्रा को वैश्विक स्तर पर एक उल्लेखनीय सफलता के रूप में देखा जाता है. वर्ष 1981 में देश में प्रति 10,000 जनसंख्या पर कुष्ठ रोग की प्रचलन दर 57.2 थी और उस समय 39.19 लाख मरीज उपचाराधीन थे. चार दशक बाद, वर्ष 2025 में यह प्रचलन दर घटकर 0.57 और उपचाराधीन रोगियों की संख्या घटकर 0.82 लाख रह गई है. यह 44 वर्षों में प्रचलन दर में करीब 99 फीसदी और उपचाराधीन मामलों में लगभग 98 फीसदी की गिरावट को दर्शाता है.
मार्च 2006 एक महत्वपूर्ण पड़ाव था, जब पहली बार राष्ट्रीय रिपोर्ट में प्रचलन दर प्रति 10,000 पर 1 से कम (0.84) दर्ज हुई. इसके बाद से नए मामलों में लगभग 37 फीसदी कमी दर्ज की गई है. इस आधार पर भारत ने आधिकारिक रूप से “कुष्ठ रोग उन्मूलन” की स्थिति हासिल की, जिसका तकनीकी अर्थ है, प्रति 10,000 आबादी पर 1 से कम प्रचलन दर. यह समूल नाश नहीं, बल्कि रोग का अत्यधिक नियंत्रण है.
बाल रोगियों के आँकड़े भी एक सकारात्मक संकेत देते हैं. 2014-15 में नए मामलों में बच्चों का प्रतिशत 9.04% था, जो 2024-25 में घटकर 4.68% रह गया है. आम तौर पर बच्चों में नए संक्रमण का कम होना यह संकेत देता है कि समुदाय में संक्रमण की चेन धीरे-धीरे कमजोर हो रही है.
फिर भी चुनौती क्यों?
प्रश्न यह उठता है कि जब देश के स्तर पर तस्वीर इतनी सुधरी है, तो छत्तीसगढ़ और कुछ राज्यों में स्थितियाँ अपेक्षाकृत खराब क्यों हैं? विशेषज्ञ इसके पीछे कुछ प्रमुख कारण है घने जंगल और दूर-दराज़ आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुँच, गरीबी, कुपोषण और भीड़भाड़ वाले घर, जो संक्रमण को बढ़ावा दे सकते हैं, सामाजिक कलंक यानी स्टिग्मा के कारण मरीजों का समय रहते सामने न आना, प्राथमिक स्तर पर रोग की पहचान करने वाले प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी या उनकी नियमित मॉनिटरिंग का अभाव और स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुँचने में दूरी, खर्च और समय की बाधाएँ.
कई मामलों में बीमारी के शुरुआती लक्षणों को सामान्य त्वचा रोग समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. मरीज तब अस्पताल पहुंचता है, जब तंत्रिका क्षति, हाथ-पैर की विकृति या आंखों की गंभीर समस्या शुरू हो चुकी होती है. इस स्तर पर उपचार से संक्रमण तो रोका जा सकता है, लेकिन विकृति को पूरी तरह ठीक करना मुश्किल होता है. यही कारण है कि छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में शीघ्र पहचान और समुदाय-स्तर पर जागरूकता सबसे बड़ी जरूरत मानी जा रही है.
छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में यह चुनौती और बड़ी है, क्योंकि यहाँ दूर-दराज़ के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतर उपलब्धता, प्रशिक्षित जनशक्ति, सड़क और परिवहन सुविधाएँ, एवं सामाजिक जागरूकता, सबको एक साथ मजबूत करना होगा. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ दवा उपलब्ध करा देने से काम पूरा नहीं होगा, जब तक कि स्कूलों में बच्चों को कुष्ठ रोग और अन्य संक्रामक रोगों के बारे में तथ्य आधारित जानकारी न दी जाए, पंचायतों और स्थानीय नेतृत्व को इस मुद्दे में सक्रिय भागीदारी न दी जाए और जिन्होंने इलाज पूरा कर लिया है, उन्हें रोल मॉडल बनाकर समुदाय के सामने लाया न जाए, ताकि लोग देखें कि रोग से लड़कर सामान्य जीवन जीना संभव है
कुल मिलाकर, कुष्ठ रोग नियंत्रण की राष्ट्रीय सफलता गाथा के बीच छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के आंकड़े एक स्पष्ट संदेश देते हैं- लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है. आंकड़े यह बताते हैं कि देश आगे बढ़ चुका है, लेकिन कुछ हिस्से अभी भी पीछे छूटे हैं. सवाल यही है कि क्या स्वास्थ्य तंत्र, स्थानीय प्रशासन और समाज मिलकर इन पीछे छूटे इलाकों को मुख्यधारा की स्वास्थ्य उपलब्धियों से जोड़ पाएंगे, या छत्तीसगढ़ की यह कड़ी चेतावनी सिर्फ रिपोर्टों के पन्नों तक सीमित रह जाएगी?