छत्तीसगढ़ में हाथी-मानव संघर्ष: 23 साल में 737 मौत, 91 घायल
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़, मध्य भारत का एक प्रमुख राज्य, अपनी प्राकृतिक समृद्धि और घने जंगलों के लिए जाना जाता है. लेकिन हाल के दशकों में यह राज्य हाथी-मानव संघर्ष (Human-Elephant Conflict - HEC) का एक प्रमुख केंद्र बन गया है. यह संघर्ष न केवल वन्यजीव संरक्षण के लिए खतरा है, बल्कि स्थानीय समुदायों के लिए भी एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौती बन गया है.
हाथी-मानव संघर्ष: हताहत और प्रभावित क्षेत्र
छत्तीसगढ़ में 2000 से 2023 के बीच 828 हाथी-मानव संघर्ष की घटनाएं दर्ज की गईं. इनमें से 737 लोगों की मौत हुई, जबकि 91 लोग घायल हुए. सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र जशपुर रहा, जहां 152 मौतें और 19 लोग घायल हुए. इसके बाद धरमजयगढ़ (135 मौतें, 20 घायल), सूरजपुर (107 मौतें, 4 घायल), और कोरबा (64 मौतें, 4 घायल) जैसे क्षेत्र हैं. कुल 321 गांव इस संघर्ष से प्रभावित हुए, जिनमें जशपुर में सबसे अधिक 66 गांव शामिल हैं. इसके बाद सूरजपुर (45 गांव), धरमजयगढ़ और बलरामपुर (प्रत्येक में 35 गांव) का स्थान है. कुछ गांव जैसे अमान्दों (45 घटनाएं), छाल (42 घटनाएं), धरमजयगढ़ (36 घटनाएं), सजबहार (32 घटनाएं), कटघोरा (28 घटनाएं), और सूरजपुर (24 घटनाएं) सबसे अधिक प्रभावित रहे.
मौसमी आंकड़ों से पता चलता है कि मानसून के दौरान (जून से सितंबर) संघर्ष की घटनाएं सबसे अधिक होती हैं, जिसमें 205 पुरुषों और 117 महिलाओं की मौत या चोटें दर्ज की गईं. पुरुषों में हताहत की संख्या (540) महिलाओं (288) की तुलना में काफी अधिक रही. यह अंतर संभवतः इसलिए है क्योंकि पुरुष अधिकतर खेतों में काम करते हैं या रात में गांवों की रखवाली करते हैं, जिससे वे हाथियों के संपर्क में अधिक आते हैं.
संघर्ष के कारण
हाथी-मानव संघर्ष के पीछे कई पारिस्थितिक और मानव-जनित कारक जिम्मेदार हैं. इनमें से प्रमुख हैं:
हैबिटेट का विखंडन: छत्तीसगढ़ में खनन, सड़क निर्माण, और शहरीकरण के कारण जंगलों का व्यापक विखंडन हुआ है. इससे हाथियों के प्राकृतिक गलियारे बाधित हुए हैं, जिसके परिणामस्वरूप वे मानव बस्तियों और कृषि क्षेत्रों में प्रवेश करने को मजबूर हो रहे हैं.
खनन गतिविधियां: कोरबा और धरमजयगढ़ जैसे क्षेत्रों में खुली खदानों ने जंगलों को नष्ट किया है, जिससे हाथियों के प्राकृतिक आवास कम हुए हैं. यह उन्हें भोजन की तलाश में मानव-नियंत्रित क्षेत्रों में धकेलता है.
प्राकृतिक गलियारों का अतिक्रमण: हाथियों के लिए सुरक्षित मार्ग (गलियारे) स्थापित करने की योजनाएं बनाई गई हैं, लेकिन इनका कार्यान्वयन अपर्याप्त रहा है. मानव गतिविधियां, जैसे कृषि और बस्तियां, इन गलियारों पर अतिक्रमण कर रही हैं.
जल संसाधनों की कमी: शुष्क मौसम में जल की कमी के कारण हाथी मानव बस्तियों के निकट जल स्रोतों की तलाश में आते हैं, जिससे संघर्ष बढ़ता है.