HC: मैट्रिक का प्रमाणपत्र उम्र निर्धारित करने का निर्णायक सबूत
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक नाबालिग के साथ बलात्कार के मामले में दोषी व्यक्ति की 10 साल की सजा को बरकरार रखते हुए महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्थापित किया है. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मैट्रिक के प्रमाणपत्र, यदि उपलब्ध और प्रामाणिक हो, तो पीड़िता की उम्र निर्धारित करने का निर्णायक सबूत है.
कोर्ट ने अपीलकर्ता योगेश पटेल की अपील खारिज कर दी, जिन्हें भानुप्रतापपुर की विशेष अदालत ने 31 दिसंबर 2021 को IPC की धारा 376(2)(n) के तहत दोषी ठहराया था.
मामला जून 2019 में दर्ज शिकायत से शुरू हुआ, जिसमें पीड़िता ने बताया कि योगेश ने दो साल तक शादी का वादा कर 2018 में नाबालिग होने पर उसके साथ जबरन यौन संबंध बनाए और 2019 में फिर वही अपराध दोहराया.
पीड़िता ने दूसरी घटना के बाद कीटनाशक खा लिया था, जिसके बाद उसने अपने माता-पिता को घटना बताई. पुलिस ने स्कूल रिकॉर्ड के आधार पर पीड़िता की जन्मतिथि 29 मई 2001 सत्यापित की, जिससे 2018 में वह 16 साल 9 महीने की थी.
हाईकोर्ट ने पीड़िता के बयान को विश्वसनीय और अटल माना, जो Cr.P.C. की धारा 164 और कोर्ट में एकसमान रहे.
मेडिकल और FSL रिपोर्ट में बलात्कार के स्पष्ट सबूत नहीं मिले, लेकिन कोर्ट ने कहा कि नाबालिग होने के कारण सहमति अप्रासंगिक है.
पीड़िता के माता-पिता और बहन के बयानों ने भी उसके आचरण की पुष्टि की.
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए पीड़िता को ‘विश्वसनीय गवाह’ माना और निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया. योगेश को शेष सजा काटने का आदेश दिया गया.