छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट: राज्य महिला आयोग की शक्ति केवल परामर्शकारी
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने एक निर्णय में यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य महिला आयोग के पास महिलाओं के अधिकारों के हनन से जुड़ी शिकायतें प्राप्त करने की शक्ति तो है, लेकिन वह किसी कर्मचारी की सेवा शर्तों को प्रभावित करने वाले बाध्यकारी निर्देश जारी नहीं कर सकता. उच्च न्यायालय ने साफ कहा कि आयोग का क्षेत्राधिकार केवल सिफारिशी और सुगमकर्ता की भूमिका तक सीमित है, जिसे वैधानिक प्रावधानों से परे जाकर बढ़ाया नहीं जा सकता.
यह फैसला न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने एक सरकारी स्कूल के प्राचार्य द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया. याचिकाकर्ता ने राज्य महिला आयोग की 6 जुलाई 2026 की उस कार्यवाही और सिफारिश को चुनौती दी थी, जिसमें आयोग ने उन्हें वर्तमान पदस्थापना स्थान से किसी अन्य ब्लॉक में स्थानांतरित करने की सिफारिश की थी.
यह मामला प्राचार्य के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्यरत एक सहायक शिक्षिका द्वारा लगाए गए आरोपों से जुड़ा था.
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध 'भवानी प्रसाद जेना बनाम संयोजक सचिव, उड़ीसा राज्य महिला आयोग' मामले के नज़ीर का हवाला दिया. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि महिला आयोग को शिकायतों पर संज्ञान लेने और संबंधित प्राधिकारियों के समक्ष मामला उठाने का अधिकार है, परंतु उसे पक्षों के अधिकारों का निर्धारण या न्यायिक न्यायनिर्णयन (अधिनिर्णयन) करने की कोई कानूनी शक्ति प्राप्त नहीं है.
अदालत ने टिप्पणी की कि केवल 'सिफारिश' शब्द का प्रयोग कर देने मात्र से किसी आदेश को वैध नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि उसके प्रभाव और मंशा को देखना आवश्यक है. जब आयोग किसी विशिष्ट दंडात्मक या प्रशासनिक कार्रवाई का निर्देश देता है और उसके क्रियान्वयन के लिए समय-सीमा निर्धारित करता है, तो ऐसी कार्रवाई के लिए कानूनी अधिकार का होना अनिवार्य है.
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य महिला आयोग की 6 जुलाई 2026 की कार्यवाही और स्थानांतरण की सिफारिश को अधिकार क्षेत्र से बाहर (बिना क्षेत्राधिकार) करार देते हुए खारिज कर दिया और याचिकाकर्ता की रिट याचिका को स्वीकार कर लिया.