अपराध की गंभीरता अकेला आधार नहीं हो सकती जमानत से इनकार करने का: छत्तीसगढ़ HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में व्यवसायी अनवर धेबर को राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो/भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो द्वारा जांच किए जा रहे कथित राइस कस्टम मिलिंग घोटाले के संबंध में नियमित जमानत प्रदान की है.
सिंगल जज बेंच जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 483 के तहत आवेदक की जमानत अर्जी पर सुनवाई की, जो ईओडब्ल्यू/एसीबी, छत्तीसगढ़ द्वारा दर्ज एफआईआर से संबंधित है. इसमें भारतीय दंड संहिता, 1860 की धाराएं 384, 409 और 120-बी तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धाराएं 11, 13(1)(ए) सहपठित धारा 13(2) के तहत अपराध दर्शाए गए हैं.
अभियोजन के अनुसार, आवेदक ने पूर्ववर्ती राज्य सरकार में काफी प्रभाव रखा था और विभिन्न विभागों के कार्यप्रणाली में शामिल था. अभियोजन ने एक अन्य कथित शराब घोटाले के संबंध में जब्त डिजिटल उपकरणों से प्राप्त कुछ व्हाट्सएप चैट पर भरोसा जताया. आरोप है कि इन चैट से पता चलता है कि आवेदक सह-आरोपी अनिल टुटेजा के संपर्क में था और नीति निर्माण, टेंडर प्रक्रिया तथा अधिकारियों की पोस्टिंग से संबंधित चर्चाएं हुईं.
आगे आरोप लगाया गया कि आवेदक ने सह-आरोपियों रोशन चंद्राकर और अनिल टुटेजा सहित मिलकर राइस कस्टम मिलिंग के लिए दिए गए विशेष प्रोत्साहन से अवैध रूप से 22 करोड़ रुपये की उगाही की साजिश रची. आवेदक को 09.07.2025 को गिरफ्तार किया गया और वे चार महीने से अधिक समय से हिरासत में थे. अभियोजन ने कहा कि आर्थिक अपराधों में जमानत के चरण में सख्त दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है.
आवेदक की ओर से तर्क दिया गया कि "प्रभाव" और "नीति में संलिप्तता" के आरोप हिरासत को उचित नहीं ठहराते तथा व्हाट्सएप चैट और डिजिटल सामग्री इस चरण में कमजोर साक्ष्य हैं. यह भी कहा गया कि कथित धन ट्रेल का कोई वसूली या स्वतंत्र प्रमाण नहीं है तथा साक्ष्यों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने की अस्पष्ट आशंकाएं जमानत से इनकार का आधार नहीं हो सकतीं.
तर्क था कि आरोप अभी तय नहीं हुए हैं और आवेदक लंबे समय से ट्रायल पूर्व कारावास झेल रहे हैं. एक प्रमुख दलील यह थी कि आवेदक की गिरफ्तारी वैधानिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती क्योंकि एफआईआर दर्ज होने के बाद उन्हें कोई समन या नोटिस नहीं जारी किया गया. साथ ही उनके परिसर में कोई तलाशी या जब्ती नहीं हुई और उनके कब्जे से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई.
हाईकोर्ट ने कहा कि जमानत अर्जी पर विचार करते समय कोर्ट से अभियोजन मामले की योग्यता पर विस्तृत परीक्षा या गहन जांच की अपेक्षा नहीं की जाती. परीक्षा का दायरा सीमित है आरोपों की प्रकृति, जांच की स्थिति, ट्रायल के उचित समय में पूरा होने की संभावना तथा संविधान के अनुच्छेद 21 के व्यापक आदेश को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्रता से निरंतर वंचित करने का औचित्य जांचना.
कोर्ट ने नोट किया कि यह स्वीकार्य स्थिति है कि आवेदक का नाम एफआईआर में नहीं था, न मूल चार्जशीट में, और उनकी संलिप्तता बाद में मुख्य रूप से सह-आरोपियों के धारा 164 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत दर्ज बयानों पर आधारित है.
कोर्ट ने दर्ज किया: “आवेदक को 09.07.2025 को गिरफ्तार किया गया, अर्थात एफआईआर दर्ज होने से एक साल सात महीने से अधिक समय बाद. इस पूरे अंतराल में उन्हें कोई नोटिस या समन जारी नहीं किया गया. उनके परिसर में कोई तलाशी या जब्ती नहीं हुई और उनके कब्जे से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई. आवेदक के संबंध में पूरक चार्जशीट पहले ही दाखिल की जा चुकी है. आरोप अभी तय नहीं हुए हैं. इस प्रकार आवेदक के संबंध में जांच काफी हद तक पूरी हो चुकी है और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सामग्री मुख्य रूप से दस्तावेजी है जो पहले से उसके कब्जे में है.”
कोर्ट ने माना कि इतने विलंब के बाद और बिना किसी प्रदर्शित हिरासत आवश्यकता के की गई गिरफ्तारी प्रथम दृष्टया असमानुपातिक लगती है. कोर्ट ने आगे कहा कि अभियोजन द्वारा वर्तमान में प्रस्तुत साक्ष्य सामग्री, खासकर जब आवेदक के संबंध में जांच पूरी हो चुकी है, निरंतर हिरासत को उचित नहीं ठहराती.
आवेदक द्वारा अनुच्छेद 21 और निर्दोषता के अनुमान के सिद्धांत का आह्वान करने पर कोर्ट ने ध्यान दिया कि आरोप अभी तय नहीं हुए हैं और ट्रायल का निकट भविष्य में पूरा होने की संभावना दूरगामी लगती है. कोर्ट ने कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में ट्रायल पूर्व चरण में निरंतर कारावास उचित नहीं होगा.
कोर्ट ने कहा: “यह कोर्ट आरोपों की गंभीरता और इसमें शामिल सामाजिक हित से अवगत है. हालांकि, गंभीरता अकेले जमानत से इनकार का आधार नहीं हो सकती. कोर्ट को निष्पक्ष ट्रायल सुनिश्चित करने की आवश्यकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के बीच संतुलन बनाना होता है. फरार होने, साक्ष्यों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने की आशंकाएं किसी ठोस सामग्री से समर्थित नहीं हैं. ऐसी आशंकाओं को कड़ी शर्तें लगाकर पर्याप्त रूप से संबोधित किया जा सकता है.”
तदनुसार, कोर्ट ने आवेदक को 1,00,000 रुपये का व्यक्तिगत मुचलका तथा इतनी ही राशि के दो स्थानीय जमानतदार ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि पर प्रस्तुत करने पर नियमित जमानत प्रदान की. जमानत कड़ी शर्तों के अधीन है, जिसमें आवेदक अपना पासपोर्ट (यदि हो) तुरंत सरेंडर करेंगे, जांच और ट्रायल में सहयोग करेंगे तथा निवास पता या मोबाइल नंबर में किसी बदलाव की सूचना ट्रायल कोर्ट को देंगे. आदेश 19.12.2025 को सुरक्षित रखा गया था और 13.01.2026 को सुनाया गया.