छत्तीसगढ़ HC: दिव्यांग आरक्षण पर राज्य सरकार और PSC से मांगा जवाब
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ की सरकारी नौकरियों में दिव्यांगों के लिए तय आरक्षित पदों में अंधत्व और कम दृष्टि (दृष्टिबाधित) वाले व्यक्तियों के लिए अलग से आरक्षण का प्रावधान न करने का मामला अब हाई कोर्ट पहुंच गया है.
बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की जस्टिस ए. के. प्रसाद की एकल पीठ ने इस मामले में राज्य शासन और छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (CGPSC) को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं.
यह याचिका भिलाई निवासी विवेक सिंह द्वारा दायर की गई है, जो "स्टारगार्डट" नामक गंभीर बीमारी के कारण 90 प्रतिशत तक कम दृष्टि दिव्यांगता से पीड़ित हैं. याचिका में कहा गया है कि 'दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम 2016' की धारा 33 और 34 के तहत कुल शासकीय नौकरियों में 4 प्रतिशत पद दिव्यांगों के लिए आरक्षित रखने का नियम है. अधिनियम की धारा 34 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि इसमें से 1 प्रतिशत पद विशेष रूप से अंधत्व या कम दृष्टि वाले व्यक्तियों के लिए अलग से आरक्षित होने चाहिए.
हालांकि, छत्तीसगढ़ PSC के विज्ञापनों में सभी श्रेणी के दिव्यांग पदों को एक ही में मिला दिया जाता है, जिससे दृष्टिबाधित अभ्यर्थियों को अन्य दिव्यांग श्रेणियों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है और वे समान अवसर से वंचित रह जाते हैं.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मध्य प्रदेश, ओडिशा और संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) जैसी संस्थाएं दृष्टिबाधितों के लिए अलग से पद आरक्षित करती हैं, जबकि छत्तीसगढ़ में इस नियम का उल्लंघन हो रहा है.
दूसरी ओर, राज्य शासन और PSC के वकीलों ने याचिका की ग्राह्यता (स्वीकार्यता) पर यह कहते हुए सवाल उठाया कि याचिकाकर्ता सीधे तौर पर परीक्षा में शामिल नहीं हो रहा है.
हालांकि, याचिकाकर्ता पक्ष ने तर्कों के साथ इस आपत्ति का खंडन किया. कोर्ट ने फिलहाल ग्राह्यता के सवाल को खुला रखते हुए शासन और PSC को अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद तय की है.