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छत्तीसगढ़ में वन अधिकार पत्र गायब

छत्तीसगढ़ में वन अधिकार पत्र गायब- द हिंदू

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13 अग. 2025, 07:32 PM 4 मिनट में पढ़ें 1

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नई दिल्ली । डेस्क: छत्तीसगढ़ के कम से कम तीन जिलों में वितरित किए गए हजारों वन अधिकार पत्र पिछले 17 महीनों में राज्य सरकार के जनजातीय कल्याण विभाग के रिकॉर्ड से गायब हो गए हैं. अंग्रेजी समाचार पत्र द हिंदू द्वारा सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों से यह जानकारी सामने आई है. राज्य सरकार के अधिकारियों ने दावा किया है कि पहले की उच्च संख्या में "गलत संचार और रिपोर्टिंग में त्रुटि" के कारण सुधार किया गया है.


उदाहरण के लिए, बस्तर जिले में जनवरी 2024 तक व्यक्तिगत वन अधिकार (आईएफआर) पत्रों की कुल संख्या 37,958 थी, जो मई 2025 तक घटकर 35,180 रह गई. इसी तरह, राजनांदगांव जिले में सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (सीएफआरआर) पत्र पिछले साल एक महीने के भीतर 40 से घटकर 20 हो गए. बीजापुर जिले में मार्च 2024 तक 299 सामुदायिक वन संसाधन अधिकार पत्र वितरित किए गए थे, जो अगले महीने 297 हो गए.


'गलत संचार' का दावा


ये कमी आरटीआई के तहत प्राप्त राज्य के जिला-वार मासिक प्रगति रिपोर्टों में देखी जा सकती है. केंद्र सरकार की सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) प्रगति रिपोर्टें केवल राज्य स्तर पर डेटा दर्ज करती हैं. कुछ वन अधिकार अधिनियम शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों ने इस कमी को "विसंगति" करार दिया है, क्योंकि वन अधिकार अधिनियम, 2006 में एक बार दिए गए पत्रों को वापस लेने की कोई प्रक्रिया नहीं है.


यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों और अन्य वनवासी समुदायों को वनों का उपयोग करने का अधिकार प्रदान करता है. यह व्यक्तियों और समुदायों को उन वन क्षेत्रों पर विभिन्न प्रकार के अधिकार पत्र प्राप्त करने की अनुमति देता है, जहां वे रहते हैं, आजीविका के लिए उपयोग करते हैं, या उत्पाद एकत्र करते हैं. इन पत्रों को ग्राम सभाओं, उप-मंडल स्तर की समितियों और जिला-स्तर की समितियों द्वारा मंजूरी के बाद वितरित किया जाता है.


वन अधिकार अधिनियम के अनुसार, एक बार दिए गए अधिकार पत्र न तो हस्तांतरणीय हैं और न ही अलग किए जा सकते हैं, बल्कि केवल उत्तराधिकार में प्राप्त किए जा सकते हैं. कानून में विशिष्ट मामलों में, जैसे कि सामुदायिक सुविधाओं या सरकारी परियोजनाओं के लिए, ग्राम सभाओं की सहमति से ही विचलन की अनुमति है.


हसदेव अरण्य बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता आलोक शुक्ला ने कहा कि इसके बावजूद, राज्य सरकार ने 2016 में कुछ अधिकार पत्र "रद्द" किए थे, और छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने अभी तक इसकी वैधता पर फैसला नहीं सुनाया है.


अधिकारियों का जवाब


कुछ जिलों में वन अधिकार पत्रों की संख्या में कमी के सवाल पर, एक वरिष्ठ राज्य सरकारी अधिकारी ने दावा किया कि यह ग्राम सभा, उप-मंडल और जिला स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों के बीच "गलत संचार" के कारण हुआ, जिसके परिणामस्वरूप रिकॉर्ड में "सुधार" की आवश्यकता पड़ी. उन्होंने कहा, "इसे रिपोर्टिंग त्रुटि के रूप में देखा जा सकता है."


आरटीआई के जवाब में प्रदान किए गए डेटा से पता चलता है कि मई 2025 तक, राज्य के 30 जिलों में जहां यह कानून लागू है, कुल 4.82 लाख आईएफआर पत्र और 4,396 सीएफआरआर पत्र वितरित किए गए हैं. राज्य अधिकारियों ने बताया कि रायपुर, दुर्ग और बेमेतरा जिलों में एफआरए लागू नहीं है. केंद्र सरकार के एफआरए डेटा के अनुसार, मई 2025 तक छत्तीसगढ़ में वन क्षेत्र का 43% से अधिक हिस्सा एफआरए पत्रों के तहत दिया गया है.


नक्सल मुक्त क्षेत्रों में धीमी प्रगति


पिछले एक साल में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा नक्सलवाद से मुक्त घोषित तीन जिलों में एफआरए का कार्यान्वयन धीमा रहा है. बस्तर में आईएफआर पत्रों की संख्या में 2,700 से अधिक की कमी आई, हालांकि जनवरी 2024 से मई 2025 के बीच 12 और सामुदायिक वन संसाधन अधिकार पत्र जोड़े गए. दंतेवाड़ा में सामुदायिक वन संसाधन अधिकार पत्रों में कोई वृद्धि नहीं हुई, जबकि व्यक्तिगत वन अधिकार पत्रों में 55 की शुद्ध वृद्धि हुई. मोहला-मानपुर जिले में कोई नया व्यक्तिगत वन अधिकार पत्र वितरित नहीं हुआ, जबकि इसी अवधि में दो सामुदायिक वन संसाधन अधिकार पत्र जोड़े गए.(स्त्रोत- द हिंदू)

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP