छत्तीसगढ़ में मुठभेड़ों में शवों को नहीं सौंपने का मसला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
SC ने कहा, अवमानना याचिका नहीं, अन्य कानूनी उपाय अपनाएं परिवार
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में छत्तीसगढ़ में एनकाउंटर पीड़ितों के शवों के कथित दुरुपयोग के संबंध में एक याचिका पर सुनवाई की. मृतकों के परिवारों ने शिकायत की थी कि उन्हें दो दिनों तक शवों तक पहुंच नहीं दी गई और अंतिम संस्कार भी सम्मानजनक तरीके से करने से वंचित रखा गया.
यह मामला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच के समक्ष आया.
सुनवाई की शुरुआत में कोर्ट ने टिप्पणी की, "हम मामले को नोट करते हैं, लेकिन अवमानना याचिका इसमें मदद नहीं करेगी."
न्यायाधीशों ने संकेत दिया कि अवमानना कार्यवाही का दायरा सीमित है और यह इस मुद्दे को संबोधित करने के लिए उपयुक्त नहीं है.
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने मामले की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा, "यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है. छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता द्वारा पोस्टमॉर्टम पूरा होने के आश्वासन के बावजूद, परिवारों को कोई जानकारी नहीं दी गई और शव खुले में छोड़ दिए गए. यहाँ तक कि राख भी परिवारों को नहीं सौंपी गई."
जस्टिस विक्रम नाथ ने बीच में टोकते हुए कहा, "इस पर बहस न करें. यदि आप चाहें, तो अन्य उपाय अपनाएं. हाई कोर्ट ने अवमानना कार्यवाही को ठीक ही बंद किया था."
बेंच ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को अवमानना कार्यवाही के बजाय अन्य कानूनी रास्ते तलाशने चाहिए.
हालांकि, वकील ने कोर्ट से अनुरोध किया कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, और कहा, "हम एनएचआरसी दिशानिर्देशों के लिए अपील करते हैं ताकि ऐसे मामलों में शवों का मानवीय तरीके से प्रबंधन सुनिश्चित हो."
जस्टिस नाथ ने जवाब में कोर्ट का रुख दोहराते हुए कहा, "अवमानना कार्यवाही के बाहर उचित उपाय अपनाएं."
कोर्ट का रुख दर्शाता है कि हालांकि उसने आरोपों की गंभीरता को स्वीकार किया, लेकिन वह हाई कोर्ट द्वारा पहले ही बंद की गई अवमानना कार्यवाही को फिर से शुरू करने के पक्ष में नहीं था.
इसके बजाय, याचिकाकर्ताओं को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) जैसे अन्य मंचों से संपर्क करने या उचित कानूनी प्रावधानों के तहत उपाय तलाशने की सलाह दी गई.