छत्तीसगढ़: बस्तर में छठवीं अनुसूची की मांग उठी
सुकमा । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बलों के निरंतर अभियानों से माओवादी प्रभाव घटने के साथ ही छठवीं अनुसूची की मांग उठना शुरू हो गया है. शुक्रवार को सुकमा जिले में आयोजित एक विशाल जनसभा में छठवीं अनुसूची लागू करने की पुरानी मांग फिर से प्रमुखता से उभरी. बस्तरिया राज मोर्चा के संरक्षक और पूर्व विधायक मनीष कुंजाम ने इस मौके पर जोरदार बयान देते हुए कहा कि वर्तमान व्यवस्था में आदिवासियों के हितों की सही ढंग से सुरक्षा नहीं हो पा रही.
मनीष कुंजाम ने सभा को संबोधित करते हुए बताया कि बस्तर फिलहाल पांचवीं अनुसूची के दायरे में आता है, लेकिन ग्राम सभाओं की मंजूरी महज कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है. उन्होंने आरोप लगाया कि कई जगहों पर फर्जी ग्राम सभाओं के जरिए जंगलों, पहाड़ियों और खनिज संसाधनों को निजी कंपनियों के हवाले किया जा रहा है. पेसा कानून का जिक्र तो किया जाता है, मगर जमीन पर उसका असर न के बराबर दिखता है.
उनके मुताबिक छठवीं अनुसूची लागू होने से स्थानीय स्वशासी संस्थाओं को प्रशासनिक और संसाधनों पर सीधा नियंत्रण मिल जाएगा, जिससे आदिवासी समुदायों की संस्कृति, जमीन और जंगलों की बेहतर रक्षा संभव होगी. कुंजाम ने स्पष्ट किया कि यह मांग किसी को विस्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि बस्तर की मूल पहचान और संसाधनों को बचाने के लिए है.
सभा में ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की भारी भीड़ जुटी रही. वक्ताओं ने चिंता जताई कि माओवादी गतिविधियां कमजोर पड़ते ही अब सरकार और कंपनियों की नजर बस्तर के खनिज-समृद्ध इलाकों पर तेजी से बढ़ गई है. सुकमा के कोंटा क्षेत्र समेत कोंटा, सुकमा और छिंदगढ़ विकासखंडों की कई पहाड़ियों में बहुमूल्य धातुओं के भंडार होने के संकेत मिले हैं.
कोंटा-जगरगुंडा रेल परियोजना का भी जिक्र हुआ, जिसके पीछे खनिज संसाधनों की संभावनाओं को एक बड़ा कारण बताया गया. कर्रेगुट्टा जैसे इलाकों में पहले नक्सल विरोधी अभियानों के नाम पर बड़े ऑपरेशन चले, लेकिन अब वहां खनन की चर्चाएं जोरों पर हैं.
गौरतलब है कि भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची और छठवीं अनुसूची दोनों ही आदिवासी समुदायों के हितों की रक्षा, उनकी संस्कृति, भूमि, जंगल और परंपराओं के संरक्षण के लिए विशेष प्रावधान करती हैं. ये अनुच्छेद 244 के अंतर्गत आती हैं और आदिवासी बहुल क्षेत्रों में उनके अधिकारों को मजबूत करने का उद्देश्य रखती हैं.
पांचवीं अनुसूची मुख्य रूप से अनुसूचित क्षेत्रों (Scheduled Areas) के प्रशासन और नियंत्रण से जुड़ी है. यह असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम को छोड़कर भारत के अन्य सभी राज्यों (जैसे छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, ओडिशा आदि) के आदिवासी बहुल इलाकों पर लागू होती है. इसमें राष्ट्रपति द्वारा क्षेत्र को अनुसूचित घोषित किया जाता है और राज्यपाल को राष्ट्रपति को प्रशासन पर रिपोर्ट देने का अधिकार होता है.
यहां जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribes Advisory Council) का गठन किया जाता है, जिसमें अधिकांश सदस्य अनुसूचित जनजातियों के प्रतिनिधि होते हैं, लेकिन यह केवल सलाह देने वाली संस्था है. राज्यपाल कुछ कानूनों को क्षेत्र में लागू न करने या संशोधित करने का फैसला ले सकते हैं, मगर कुल मिलाकर राज्य और केंद्र का नियंत्रण अधिक रहता है. इसका फोकस आदिवासियों के संरक्षण पर ज्यादा है, जबकि स्वशासन की तुलना में कम सहभागिता होती है.
दूसरी ओर, छठवीं अनुसूची जनजातीय क्षेत्रों (Tribal Areas) के प्रशासन से संबंधित है और केवल असम, मेघालय, त्रिपुरा तथा मिजोरम के कुछ विशेष आदिवासी इलाकों पर लागू होती है. यहां राज्यपाल द्वारा स्वायत्त जिला (Autonomous Districts) या क्षेत्र घोषित किए जाते हैं और स्वायत्त जिला परिषद (District Council) तथा क्षेत्रीय परिषद (Regional Council) का गठन होता है.
इन परिषदों को भूमि, जंगल, जल, कृषि, विवाह-तलाक, सामाजिक रीति-रिवाज, गांव प्रशासन आदि पर विधायी शक्तियां (कानून बनाने का अधिकार) प्राप्त हैं. वे ग्राम न्यायालय बना सकते हैं, कुछ कर लगा सकते हैं और संसद व राज्य विधानमंडल के कानूनों का प्रभाव यहां कम रहता है (परिषद के कानूनों को राज्यपाल की मंजूरी चाहिए). इसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय समुदायों को अधिक स्वायत्तता और स्वशासन प्रदान करना है.
दोनों में मुख्य अंतर यह है कि पांचवीं अनुसूची संरक्षणात्मक और राज्यपाल-केंद्रित व्यवस्था पर आधारित है, जहां स्वायत्तता सीमित है और परामर्शदात्री भूमिका ज्यादा है, जबकि छठवीं अनुसूची स्वशासन प्रधान है, जिसमें परिषदों को विधायी, न्यायिक और वित्तीय शक्तियां मिलती हैं, जिससे आदिवासी समुदायों को अपने संसाधनों और संस्कृति पर ज्यादा नियंत्रण मिलता है.
बस्तर जैसे क्षेत्रों में छठवीं अनुसूची की मांग इसी वजह से उठती है, क्योंकि यह स्थानीय स्तर पर बेहतर संरक्षण और निर्णय लेने की शक्ति दे सकती है.