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छत्तीसगढ़: गोबर खाद याने मौत को बुलावा

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14 जुल. 2025, 09:19 PM 5 मिनट में पढ़ें 2

गोबर खाद
गोबर खाद

रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ में गोबर खाद का उपयोग करके मौत को बुलावा दिया जा रहा है. क्योंकि मवेशियों के गोबर में पनप रहा एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस का खतरा. और एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस का अर्थ है साधारण संक्रमण से भी मौत का हो जाना. छत्तीसगढ़ में गोबर खाद का बहुतायत से उपयोग होता है, ऐसे में जान लेना चाहिये कि इससे क्या खतरा है और मानव जीवन के लिये वह कितना खथरनाक है.


बता दें कि मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी और अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में पाया है कि पशुओं के गोबर में एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस जीन्स भरे पड़े हैं, जो इंसानों के स्वास्थ्य के लिये गंभीर खतरा बन सकते हैं. इस अध्ययन के नतीजे जर्नल साइंस एडवांसेज में प्रकाशित हुये हैं. गौरतलब है कि यह मवेशियों के गोबर में मौजूद एंटीबायोटिक प्रतिरोधी जीनों पर किया अब तक का सबसे व्यापक अध्ययन है.

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14 वर्षों तक चले इस इस वैश्विक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने 26 देशों से 4,000 से ज्यादा गोबर के नमूनों की जांच की. इस दौरान गाय, सूअर और मुर्गियों के गोबर का विश्लेषण किया गया. इस विश्लेषण के जो नतीजे सामने आये हैं, वो हैरान कर देने वाले हैं.


वैज्ञानिक नतीजे दर्शाते हैं कि जानवरों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के असर से ऐसे जीन बन रहे हैं जो इंसानी शरीर में जाकर एंटीबायोटिक्स को बेअसर कर सकते हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम उस दौर की ओर बढ़ रहे हैं जब मामूली बुखार भी जानलेवा हो सकता है?


वैज्ञानिकों के मुताबिक पशुओं का गोबर एंटीबायोटिक रेसिस्टेंस जीन का एक बड़ा स्रोत है. इनमें से कुछ जीन इंसानों को बीमार करने वाले बैक्टीरिया तक पहुंच सकते हैं. अगर ये जीन दूषित पानी, भोजन या पर्यावरण के जरिये हम तक पहुंच जायें, तो सामान्य संक्रमणों का इलाज करना बेहद मुश्किल या कभी-कभी नामुमकिन हो सकता है, क्योंकि इस स्थिति में आम दवाएं भी बीमारियों पर असर नहीं करेंगी.


रिसर्च में यह भी सामने आया है कि जिन देशों में कृषि में एंटीबायोटिक का कम इस्तेमाल हो रहा है, वहां इसका खतरा कम है. उत्साहजनक बात यह है कि अध्ययन में ऐसे संकेत मिले हैं कि कई देशों में कृषि क्षेत्र में एंटीबायोटिक के उपयोग को कम करने के प्रयास सफल हो रहे हैं.


उदाहरण के लिए डेनमार्क और अन्य यूरोपीय देशों ने कई साल पहले ही पशुओं की ग्रोथ के लिये एंटीबायोटिक का उपयोग बंद कर दिया था. अमरीका ने भी 2017 में "वेटरनरी फीड डायरेक्टिव" लागू किये, जबकि चीन ने भी इसको लेकर सख्त नियम बनाए हैं.


तीनों जगहों पर, समय के साथ गोबर में मौजूद प्रतिरोधी जीन में कमी आई है. इससे पता चलता है कि ये नीतियां कारगर हैं. लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है.


बता दें कि खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) ने भी अपने अध्ययन में चेताया है कि यदि समय रहते कार्रवाई न की गई तो पशुओं में एंटीबायोटिक का उपयोग 2040 तक 30 फीसदी बढ़ सकता है.


अध्ययन के मुताबिक 2019 में वैश्विक स्तर पर पशुओं में 110,777 टन एंटीबायोटिक्स का उपयोग किया गया. वहीं अंदेशा है कि 2040 तक यह आंकड़ा बढ़कर 143,481 टन तक पहुंच जाएगा. मतलब कि आने वाले वर्षों में इसमें 29.5 फीसदी की वृद्धि हो सकती है.


अंतराष्ट्रीय जर्नल साइंस में छपी एक अन्य रिपोर्ट से पता चला है कि कृषि में बेतहाशा उपयोग के चलते भारत और चीन के पशुओं में एंटीबायोटिक रेसिस्टेन्स का खतरा करीब तीन गुना बढ़ गया हैं, जो इंसानो पर मंडराते एक बड़े खतरे की ओर इशारा करता है. 


गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया भर में बेची जाने वाले 73 फीसदी एंटीबायोटिक्स का उपयोग उन जानवरों पर किया जाता है, जिन्हे भोजन के लिए पाला गया है.


आइये अब देखते हैं कि छत्तीसगढ़ में गोबर खाद की क्या स्थिति है? छत्तीसगढ़ में कृषि का रकबा कितना है तथा जैविक खाद की क्या स्थिति है.


छत्तीसगढ़ का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 138 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से फसल उत्पादन का निरा क्षेत्र 46.51 लाख हेक्टेयर है, जो कि कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 34 फीसदी है. राज्य के लगभग 57 फीसदी क्षेत्र में मध्यम से हल्की भूमि है.


छत्तीसगढ़ में जैविक खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है. राज्य सरकार जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिये कई योजनाएं चला रही है, और कई जिलों को पूर्ण जैविक जिले के रूप में विकसित किया जा रहा है. 


छत्तीसगढ़ में जैविक खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है. कई जिलों को पूर्ण जैविक जिले के रूप में विकसित किया जा रहा है, और किसानों को जैविक खेती करने के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है. 


रासायनिक खाद से निर्भरता कम करने को जैविक खाद के उत्पादन को लेकर एक लंबी अवधि की योजना बनाई जा रही है. इसके अनुसार, केंद्र सरकार की मंशा गौशालाओं से जैविक खाद के उत्पादन और उसके बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग पर है.


रासायनिक खाद से निर्भरता कम करने को जैविक खाद के उत्पादन को लेकर एक लंबी अवधि की योजना बनाई जा रही है. इसके अनुसार, केंद्र सरकार की मंशा गौशालाओं से जैविक खाद के उत्पादन और उसके बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग पर है. 


इस योजना से वर्मीकम्पोस्ट और बायोगैस उत्पादन से ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का विकास होगा. इसके साथ ही मवेशियों को आर्थिक संपत्ति में बदलने में मदद मिलेगी.


हम जैविक खाद के विरोधी नहीं हैं लेकिन यदि उससे एंटीबायोटिक रेसिंस्टेंस बढ़ता है तो हम उस पर आपको आगाह करना चाहते हैं. 


गोबर में एंटीबायोटिक रेसिंस्टेंस जीन न हो इसके लिये हम प्रयासरत हैं. एक हॉलीवुड की फिल्म आई थी जिसमें कहा गया था कोलालेट्रल डैमेज. हम इसी डैमेज की बात कर रहें हैं. जैविक खेती तो सबसे अच्छा है लेकिन उससे एंटीबायोटिक रेसिंस्टेंस न बढ़े उसके लिये काम करने की जरूरत है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP