छत्तीसगढ़ में 25 फीसदी लोगों को शुगर-हाई ब्लडप्रेशर
छत्तीसगढ़ में 25 फीसदी लोगों को शुगर-हाई ब्लडप्रेशर है
रायपुर | आयुषी शर्मा : विश्व मधुमेह दिवस से पहले छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य विभाग ने एक चिंताजनक और साथ ही महत्वपूर्ण तस्वीर सामने रखी है. राज्य में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों की जांच में पिछले कुछ महीनों में बड़ी प्रगति हुई है, लेकिन यही प्रगति राज्य के सामने खड़ी बड़ी स्वास्थ्य चुनौती की ओर भी इशारा कर रही है.
अप्रैल से अक्टूबर 2025 के बीच, पूरे छत्तीसगढ़ में 38.6 लाख से ज़्यादा नागरिकों की शुगर के लिए और 37.7 लाख लोगों की ब्लड प्रेशर के लिए जांच की गई है. यह संख्या अपने आप में बड़ी है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, यह राज्य की कुल वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दिखाती, क्योंकि सभी संभावित मरीज जांच के लिए स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंच ही नहीं पाते.
इन जांचों में 6.88 लाख लोगों में डायबिटीज और 11.82 लाख लोगों में हाई ब्लड प्रेशर की पहचान हुई है. प्रारंभिक विश्लेषण के आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि राज्य में तकरीबन 25 फीसदी वयस्क आबादी किसी न किसी रूप में शुगर या हाई ब्लड प्रेशर से प्रभावित हो सकती है. यह आँकड़ा शुगर तथा हाई ब्लड प्रेशर के अलग-अलग मरीजों की जांच का निष्कर्ष है. यदि यह माना जाए कि बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिनमें दोनों बीमारियां एक साथ हैं और उनकी दोनों जांच दर्ज हैं, तो यह अनुपात लगभग 49 फीसदी तक पहुँच सकता है. इस संभावना के चलते यह स्थिति और भी गंभीर हो जाती है और जन-स्वास्थ्य के लिए स्पष्ट रूप से खतरे की घंटी बनकर सामने आती है.
किसी भी राज्य के एक चौथाई या लगभग आधे वयस्कों में शुगर-हाई ब्लड प्रेशर जैसे रोगों का होना आने वाले समय में हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी फेल्योर, दृष्टि संबंधी समस्याएं और समय से पहले मृत्यु के मामलों में भारी वृद्धि का संकेत माना जाता है. यह सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी भारी बोझ की चेतावनी है.
राज्य सरकार का कहना है कि जिन मरीजों की पहचान हुई है, उन्हें अब छत्तीसगढ़ की एकीकृत NCD देखभाल प्रणाली के तहत इलाज, सलाह और नियमित फॉलो-अप उपलब्ध कराया जा रहा है. स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार यह स्क्रीनिंग कार्यक्रम ‘स्क्रीनिंग से सेवा तक’ मॉडल पर काम कर रहा है. इसके तहत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों तक शुगर और ब्लड प्रेशर की जांच, दवाओं की उपलब्धता और परामर्श सेवाओं की व्यवस्था की गई है, ताकि मरीजों को घर के नज़दीक ही निरंतर देखभाल मिल सके.
रायपुर सर्किट हाउस में आयोजित एक राज्य-स्तरीय स्वास्थ्य समीक्षा बैठक के दौरान स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया की अध्यक्षता में एक विशेष NCD स्क्रीनिंग कैंप भी लगाया गया. इस कैंप में 110 स्वास्थ्य अधिकारियों और कर्मचारियों की जांच की गई, जिनमें से 41 में हाई ब्लड प्रेशर और 9 में हाई शुगर की पहचान हुई. यह आंकड़ा खुद स्वास्थ्य तंत्र के अंदर बढ़ते जोखिम को दर्शाता है और यह संकेत देता है कि तनावपूर्ण कार्य, अनियमित दिनचर्या और शारीरिक गतिविधि की कमी का असर स्वास्थ्यकर्मियों पर भी स्पष्ट रूप से दिख रहा है.
स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया ने स्वास्थ्य प्रबंधन में आत्म-जागरूकता पर ज़ोर देते हुए कहा, “स्वस्थ नागरिक ही स्वस्थ राज्य की नींव हैं. नियमित जांच और संतुलित जीवनशैली सबसे अच्छी दवा है.”
उन्होंने अधिकारियों से अपील की कि वे खुद उदाहरण बनकर फील्ड स्तर पर नागरिकों को संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, तनाव प्रबंधन और नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करें, ताकि यह संदेश केवल कागज़ों तक सीमित न रहे, बल्कि हर गांव, हर बस्ती तक पहुँच सके.
छत्तीसगढ़ की यह तस्वीर, भारत और दुनिया भर में बढ़ते डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर के संकट का हिस्सा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया भर में करीब 53 करोड़ वयस्क डायबिटीज से जूझ रहे हैं और करोड़ों लोग प्री-डायबिटिक स्थिति में हैं, जिन्हें समय पर पहचान न मिले तो वे आने वाले वर्षों में डायबिटीज के मरीज बन सकते हैं. हाई ब्लड प्रेशर की स्थिति तो इससे भी व्यापक है, वैश्विक स्तर पर लाखों मौतें हर साल केवल अनियंत्रित ब्लड प्रेशर से जुड़ी जटिलताओं के कारण होती हैं.
भारत की बात करें तो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण और अन्य सरकारी अध्ययनों के अनुसार, देश के कई राज्यों में 15 वर्ष से ऊपर की आबादी में हाई ब्लड प्रेशर और शुगर के मामलों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि शहरी जीवनशैली, फास्ट फूड, शारीरिक गतिविधि की कमी, बढ़ता तनाव, नींद की कमी और तंबाकू-मद्यपान जैसी आदतें इस संकट को और गहरा कर रही हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में भी अब यह बीमारियां तेजी से फैल रही हैं, जबकि पहले इन्हें ‘शहरों की बीमारी’ माना जाता था.
डॉक्टरों का कहना है कि डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शुरुआती दौर में अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण नज़र नहीं आते. लोग खुद को सामान्य मानते रहते हैं, जबकि अंदर ही अंदर शरीर को नुकसान हो रहा होता है. जब तक पैरों में सुन्नपन, आंखों की रोशनी कम होना, सीने में दर्द, स्ट्रोक या किडनी से जुड़ी गंभीर समस्या सामने आती है, तब तक बीमारी कई साल पुरानी हो चुकी होती है. यही कारण है कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ 30 वर्ष से ऊपर के हर व्यक्ति को साल में कम से कम एक बार शुगर और ब्लड प्रेशर की जांच करवाने की सलाह दे रहे हैं, भले ही कोई लक्षण न हों.
छत्तीसगढ़ में चल रहा यह व्यापक NCD स्क्रीनिंग कार्यक्रम, समय रहते मरीजों की पहचान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. लेकिन साथ ही यह सवाल भी खड़ा हो रहा है कि क्या केवल जांच और दवा से ही तस्वीर बदलेगी, या हमें जीवनशैली में बुनियादी बदलाव की ओर भी गंभीरता से बढ़ना होगा? शहरों में पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए सुरक्षित रास्ते, स्कूलों में बच्चों को नियमित व्यायाम और खेल की अनिवार्यता, दफ्तरों में लंबे समय तक बैठे रहने की आदत पर रोक, और सार्वजनिक स्थानों पर हेल्दी फूड के विकल्प, ये सब बातें अब केवल सुझाव नहीं, बल्कि नीति का हिस्सा बननी पड़ेंगी.
छत्तीसगढ़ में सामने आए ताज़ा आंकड़े चेतावनी भी हैं और मौका भी. चेतावनी इसलिए कि बीमारी का दायरा बड़ा है, और मौका इसलिए कि समय रहते इसे नियंत्रित किया जा सकता है. सवाल अब सिर्फ यह है कि क्या हम, एक समाज के रूप में, चेतावनी को समझकर इस मौके का लाभ उठा पाएंगे?