नेपाल में बाढ़ का कारण, क्या आगे भी खतरा है?
नई दिल्ली । डेस्क: नेपाल के पर्वतीय क्षेत्र में बुधवार को आई भीषण फ्लैश फ्लड (अचानक आई बाढ़) ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है. इस जलप्रलय ने न केवल सैकड़ों लोगों की जान ली और भारी तबाही मचाई, बल्कि इस सवाल को भी फिर से सामने ला दिया है कि क्या हिमालयी देशों पर आने वाले समय में इससे भी बड़ा खतरा मंडरा रहा है.
बाढ़ की तात्कालिक वजह: ग्लेशियर का टूटना और मलबे का रुकना
वैज्ञानिकों के शुरुआती अध्ययनों के अनुसार, इस तबाही का मुख्य कारण एक विशाल ग्लेशियर का टूटकर नदी में गिरना था. ल्हेंदे खोला और भोटे कोशी नदी के ऊपरी हिस्से में ग्लेशियर की बर्फ और चट्टानों का भारी हिस्सा गिर गया, जिससे लगभग 5.2 तीव्रता के बराबर भूकम्पीय तरंगे (सीस्मिक वेव्स) दर्ज की गईं.
इस भारी मलबे ने नदी के बहाव को अस्थायी रूप से रोक दिया, जिससे एक अस्थाई झील या जलाशय बन गया. कुछ ही घंटों बाद जब पानी का प्रचंड दबाव इस मलबे के बांध को तोड़कर नीचे भागा, तो निचले इलाकों में अचानक जलप्रलय आ गया. महज 30 मिनट में नदियों का जलस्तर 9 मीटर (करीब 30 फीट) तक बढ़ गया, जिसने बस्तियों, सड़कों, पुलों और पनबिजली परियोजनाओं को बहने का मौका तक नहीं दिया.
क्या आगे भी खतरा है? भविष्य की भयावह तस्वीर
वैज्ञानिकों का साफ मानना है कि यह कोई अकेली घटना नहीं है, बल्कि भविष्य में ऐसे खतरों की आवृत्ति और तेजी दोनों बढ़ने वाली हैं.
गर्म होता हिमालय: हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में काफी तेजी से गर्म हो रहा है. वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण इस क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. अध्ययनों के अनुसार, इस सदी के अंत तक हिमालय के 50% से 65% तक ग्लेशियर गायब हो सकते हैं.
कमजोर पड़ती चट्टानें और पर्माफ्रॉस्ट: ग्लेशियरों के पीछे हटने से उनके पीछे की चट्टानें सीधी धूप और तापमान के संपर्क में आ रही हैं. पहाड़ों को आपस में बांधकर रखने वाली जमी हुई बर्फ पिघल रही है, जिससे पहाड़ों के ढलान बेहद कमजोर और अस्थिर हो रहे हैं.
ग्लेशियर झीलों का फटना (GLOFs): पिघलते ग्लेशियर लगातार नई झीलों का निर्माण कर रहे हैं. 21वीं सदी में हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों के फटने की घटनाएं नाटकीय रूप से बढ़ी हैं. भविष्य में इन झीलों के टूटने से नेपाल ही नहीं, बल्कि निचले सीमावर्ती देश (जैसे भारत) के लिए भी बाढ़ का खतरा लगातार बना हुआ है.
कैस्केडिंग आपदाओं की नई सामान्य स्थिति (New Normal): विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब 'कैस्केडिंग डिजास्टर' यानी एक के बाद एक जुड़ने वाली आपदाएं सामान्य बात होती जा रही हैं. एक पहाड़ी का खिसकना या ग्लेशियर टूटना, नदी को रोकना और फिर भीषण बाढ़ बनकर तबाही मचाना अब एक श्रृंखला बन चुका है.
पूर्व चेतावनी तंत्र और बुनियादी ढांचे पर संकट
पहाड़ी ढलानों और बेहद संकीर्ण घाटियों के कारण जब ऐसी आपदाएं आती हैं, तो चेतावनी जारी करने और लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए सिर्फ कुछ मिनटों का समय ही मिल पाता है.
वैज्ञानिकों का मानना है कि बढ़ते तापमान और पिघलती बर्फ के कारण हिमालयी क्षेत्र अब एक ऐसी सीमा तक पहुंच चुके हैं, जहां सिर्फ मौसम की निगरानी काफी नहीं है. जब तक सीमा पार डेटा-शेयरिंग, मजबूत अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और पर्वतीय क्षेत्रों में बिना सोचे-समझे किए जा रहे इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण पर रोक नहीं लगेगी, तब तक नेपाल और उसके आसपास के हिमालयी क्षेत्रों पर विनाशकारी बाढ़ का खतरा हमेशा मंडराता रहेगा.