कैग का खुलासा: परिसीमन में देरी से 1,600 शहरी निकायों में चुनाव ठप
नई दिल्ली । डेस्क: नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की वर्ष 2024 की नवीनतम रिपोर्ट ने देश में स्थानीय निकाय चुनावों में हो रही देरी और परिसीमन की शक्तियों के दुरुपयोग को लेकर एक बड़ा खुलासा किया है. "74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम (CAA), 1992 के कार्यान्वयन पर प्रदर्शन लेखापरीक्षा के संकलन: भारत भर का परिदृश्य" शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में कैग ने स्पष्ट रूप से कहा है कि कई राज्यों में नागरिक निकाय चुनाव इसलिए लंबित हैं क्योंकि राज्य सरकारें नगर निकायों के वार्डों के परिसीमन की प्रक्रिया को रोके हुए थीं.
ऑडिट के दौरान यह पाया गया कि वार्डों के परिसीमन के लिए राज्य चुनाव आयोगों (SECs) को सशक्त न करना राज्य सरकारों के लिए एक ऐसी शक्ति बन गया है, जिसका उपयोग वे वार्डों की सीमाओं को तय करने में करती हैं. यह अक्सर समय पर नगर निकाय चुनाव कराने में एक बड़ी बाधा बन जाता है.
कैग की रिपोर्ट के अनुसार, 17 राज्यों के कुल 2,625 शहरी स्थानीय स्वशासी निकायों (ULSGs) में से 1,600 निकायों में निर्वाचित परिषद अस्तित्व में नहीं थी.
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी सिफारिश की थी कि वार्डों के परिसीमन और आरक्षण का कार्य राज्य चुनाव आयोगों को सौंपा जाना चाहिए, लेकिन हिमाचल प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों को छोड़कर 11 अन्य राज्यों ने यह शक्ति अभी भी अपने पास ही रखी है. झारखंड, मणिपुर और त्रिपुरा जैसे राज्यों के लिए तो डेटा भी उपलब्ध नहीं था.
कैग की इन टिप्पणियों ने परिसीमन शक्ति के राजनीतिक दुरुपयोग की आशंकाओं को पुख्ता कर दिया है, जिसे लेकर विपक्षी दल केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं.
हाल ही में लोकसभा में एनडीए सरकार का 131वां संविधान संशोधन विधेयक गिर गया, जिसने विवाद को और हवा दी है. यह विधेयक केंद्र सरकार को लोकसभा सीटों के आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों के विभाजन के लिए अधिक व्यापक शक्तियां देना चाहता था.
इस बिल के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 82 में संशोधन का प्रस्ताव था, ताकि "प्रत्येक जनगणना की समाप्ति पर" शब्द हटाए जा सकें, जिसका सीधा अर्थ था कि सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर भी परिसीमन कर सकती थी.
विपक्षी दलों, विशेषकर डीएमके सांसद कनिमोझी और पी. विल्सन ने इस कदम की तीखी आलोचना की है. कनिमोझी का तर्क है कि बिल के प्रावधान बेहद अस्पष्ट थे और यह वर्तमान सरकार को अपनी पसंद की जनगणना का डेटा इस्तेमाल करने की मनमानी शक्ति प्रदान कर रहे थे.
इसके अलावा, परिसीमन आयोग के गठन में मुख्य न्यायाधीश या संसद से सलाह न लेने के प्रस्ताव ने भी पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए.
पूर्व केंद्रीय मंत्री वी. किशोर चंद्र देव ने इस पूरे घटनाक्रम को केंद्र द्वारा शक्तियों के केंद्रीकरण के प्रयास के रूप में देखा है. उनका मानना है कि कैग की रिपोर्ट ने जिस तरह राज्यों द्वारा हार के डर से चुनाव टालने के लिए परिसीमन का उपयोग करने की बात कही है, वही खतरा अब राष्ट्रीय स्तर पर मंडरा रहा है.
1976 में हुए 42वें संशोधन और 2002 के 84वें संशोधन के बाद सीटों का आवंटन 2026 तक के लिए फ्रीज है. चूंकि अब 2026 की समयसीमा निकट है, ऐसे में परिसीमन की प्रक्रिया और इसमें पारदर्शिता का अभाव भारतीय संघीय ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती पेश कर रहा है.
केंद्र और राज्यों के बीच इस शक्ति संघर्ष ने लोकतंत्र की बुनियादी इकाई, यानी स्थानीय निकायों से लेकर संसद तक के चुनावी भविष्य पर एक अनिश्चितता खड़ी कर दी है.