‘बोर्ड ऑफ पीस’: फ़िलिस्तीनियों की राय के बिना गाजा पर फैसला कैसे?
बीजिंग । डेस्क: अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप का ‘बोर्ड ऑफ पीस’ अमेरिका द्वारा पेश किए गए 20-सूत्रीय शांति प्रस्ताव का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य इज़रायल–हमास संघर्ष को समाप्त करना बताया गया है.
प्रस्तावित चार्टर के अनुसार, इस बोर्ड की अध्यक्षता स्वयं राष्ट्रपति ट्रंप करेंगे और सदस्यता पूरी तरह अध्यक्ष के निमंत्रण पर आधारित होगी. बोर्ड के कार्यकाल, नवीनीकरण और सदस्य हटाने जैसे सभी अहम अधिकार भी अध्यक्ष के पास होंगे.
अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि इस बोर्ड की “स्थायी सीटों” की कीमत कथित तौर पर एक-एक अरब डॉलर तय की गई है. इसे अंतरराष्ट्रीय मामलों के “निजीकरण” और क्षेत्रीय शांति के “व्यावसायीकरण” के रूप में देखा जा रहा है.
आलोचकों का कहना है कि यह न केवल फ़िलिस्तीनी जनता की इच्छा की अनदेखी है, बल्कि मौजूदा वैश्विक शासन व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के लिए भी एक गंभीर चुनौती है.
करीब 30 महीनों से जारी इज़रायल–फ़िलिस्तीन संघर्ष के बीच गाजा में मानवीय संकट लगातार गहराता जा रहा है. ऐसे समय में व्हाइट हाउस द्वारा ‘बोर्ड ऑफ पीस’ का प्रस्ताव अमेरिकी प्रभाव दिखाने की कोशिश माना जा रहा है.
हालांकि, जिस संस्था को गाजा में शांति की जिम्मेदारी दी जा रही है, उसे कई विश्लेषक “लेन-देन आधारित कूटनीति” का उदाहरण बता रहे हैं. प्रस्तावित नामों की सूची में अमेरिकी नेताओं और उनके करीबी सहयोगियों का दबदबा है, जबकि सबसे अहम पक्ष फ़िलिस्तीनी इससे पूरी तरह अनुपस्थित हैं.
इस अनुपस्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है. कई जानकारों ने इसे “औपनिवेशिक मानसिकता” का प्रतीक बताया है, जिसमें फ़िलिस्तीनी जनता की सहमति के बिना गाजा के भविष्य की रूपरेखा तय करने की कोशिश की जा रही है.
जानकारों का मानना है कि यह प्रस्ताव न तो मौजूदा संकट का समाधान कर पाएगा और न ही मध्य पूर्व में स्थायी शांति की दिशा में मददगार होगा.
उलटे, यह फ़िलिस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण की भूमिका को कमजोर करता है और बाहरी ताकतों के नियंत्रण वाली व्यवस्था को बढ़ावा देता है, जिससे दो-राष्ट्र समाधान की नींव और कमजोर पड़ सकती है.
अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का कहना है कि यदि शांति जैसी मूलभूत अवधारणा को धन के आधार पर बेचा जाने लगा, तो वैश्विक शासन व्यवस्था की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुंचेगा. यह दुनिया को फिर से “जिसकी ताकत, उसकी बात” वाले दौर की ओर ले जा सकता है.
जानकारों और कई देशों का मत है कि इज़रायल–फ़िलिस्तीन समस्या का समाधान केवल संयुक्त राष्ट्र के ढांचे के भीतर, न्याय और समानता के सिद्धांतों के आधार पर ही संभव है.
गाजा के पुनर्निर्माण और शासन से जुड़े सभी फैसलों में “फ़िलिस्तीनियों द्वारा फ़िलिस्तीन का शासन” मूल आधार होना चाहिए. अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की जा रही है कि वह भू-राजनीतिक खेलों को अंतरराष्ट्रीय कानून से ऊपर रखने की इस प्रवृत्ति के प्रति सतर्क रहे.
Input- Global Times