बस्तर में यह सब्जी 3000 रु किलो
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बस्तर में बोड़ा 3000 रुपये किलो बिक रहा है. दरअसल, यह एक प्रकार का फफूंद या मशरूम है जो जून जुलाई के माह में बस्तर में मिलता है. यह साल के पेड़ के छांव में पत्तियों के सड़ जाने पर उगती है. इसे उगाया नहीं जा सकता यह प्रकृति का जैविक चमत्कार है. यह जंगलों में उगता है तथा आदिवासी महिलायें इन्हें चुनकर शहरों के बाजार में लाकर 2500-3000 रुपये प्रति किलो की दर से बेचती है. शायद यह भारत की सबसे महंगी सब्जी है राजस्थान में मिलने वाली केर सांगरी भी 1000-1500 रुपये में मिल जाती है.
बोड़ा को सुपर फूड माना जाता है. इसमें प्रोटीन, विटामिन बी, अमीनो एसिड और एंटीऑक्सिडेंट्स प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं. जानकारों के अनुसार यह बोड़ा इंफेक्शन, उच्च रक्तचाप, शुगर और कुपोषण जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिये फायदेमंद है. इन दिनों यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है. बस्तर के लोग बताते हैं कि इसका स्वाद मटन और चिकन से भी बेहतर होता है, यही वजह है कि इसे चखने के लिये लोग दूर-दूर से बस्तर पहुंचते हैं.
हर साल जून-जुलाई में मानसून की शुरुआत के साथ बस्तर के जंगलों में बोड़ा उगता है. यह केवल कुछ हफ्तों तक ही उपलब्ध रहता है, जिसके कारण इसकी मांग और कीमत दोनों आसमान छूती हैं. वैज्ञानिकों के लिये बोड़ा एक पहेली बना हुआ है. लाख कोशिशों के बावजूद इसे कृत्रिम रूप से उगाने का तरीका खोजा नहीं जा सका है. यह केवल साल के पेड़ों के नीचे, पत्तों की सड़न और नमी के खास मेल में ही उगता है. इसकी यह खासियत इसे और भी अनमोल बनाती है.
महुआ और तेंदूपत्ता के बाद बोड़ा बस्तर के ग्रामीणों के लिये मौसमी आय का एक बड़ा स्रोत बन गया है. खासकर आदिवासी समुदाय की महिलायें इसे जंगलों से चुनकर कर बाजारों में बेचती हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है. इसकी ऊंची कीमत और सीमित उपलब्धता के कारण बोड़ा न केवल स्थानीय लोगों के लिये, बल्कि बस्तर की अर्थव्यवस्था के लिए भी वरदान साबित हो रहा है.
बस्तर में बोड़ा को विभिन्न तरीकों से पकाया जाता है, जैसे कि तलकर, करी बनाकर या चटनी के रूप में. इसका अनोखा स्वाद इसे हर उम्र के लोगों में लोकप्रिय बनाता है. बोड़ा का उगना जंगल की सेहत का भी संकेत देता है. यह केवल स्वच्छ और प्राकृतिक पर्यावरण में ही पनपता है, जो बस्तर के जंगलों की जैव-विविधता को दर्शाता है. आदिवासी समुदाय में बोड़ा न केवल भोजन का हिस्सा है, बल्कि उनकी संस्कृति और परंपराओं से भी जुड़ा है. इसे मेहमानों को परोसना सम्मान का प्रतीक माना जाता है. जलवायु परिवर्तन और जंगलों की कटाई के कारण बोड़ा का उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे इसकी उपलब्धता भविष्य में कम हो सकती है.
बस्तर का बोड़ा न सिर्फ एक सब्जी है, बल्कि यह प्रकृति, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का अनूठा संगम है. इसकी ऊंची कीमत के बावजूद यह सवाल नहीं उठता कि यह महंगा क्यों है, बल्कि यह सवाल उठता है कि यह अनमोल खजाना अब तक दुनिया की नजरों से कैसे छिपा रहा.