बस्तर: बिना बजट स्कूल 'डेंजर जोन' में, कैसे सुरक्षित रहेंगे नौनिहाल?
जगदलपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने में अब चंद दिनों का समय ही शेष रह गया है, लेकिन सरकारी स्कूलों की बदहाल सूरत ने विभागीय दावों की पोल खोलकर रख दी है. जिले के 60 से ज्यादा सरकारी स्कूल भवन इस वक्त बेहद जर्जर और खतरनाक स्थिति में पहुंच चुके हैं, जिन्हें शिक्षा विभाग ने खुद 'डेंजर जोन' की श्रेणी में रखा है.
चिंता की बात यह है कि इन जीर्ण-शीर्ण इमारतों के जीर्णोद्धार के लिए विभाग के पास फिलहाल कोई बजट उपलब्ध नहीं है. ऐसे में आगामी सत्र में भी मासूम बच्चों को अपनी जान जोखिम में डालकर इन्हीं दरकती दीवारों और कमजोर छतों के नीचे बैठने पर मजबूर होना पड़ेगा, जिससे अभिभावकों में भारी डर और नाराजगी का माहौल है.
मानसून की दस्तक के साथ ही इन शिक्षण संस्थानों में स्थिति और भयावह हो जाती है, जहां छतों से पानी टपकने के कारण पढ़ाई पूरी तरह बाधित होती है और बच्चे सूखी जगह तलाशने को विवश हो जाते हैं.
जिले के कई ग्रामीण और शहरी इलाकों में हालत इतनी गंभीर है कि तोकापाल ब्लॉक के बारूपाटा में 56 साल पुराना स्कूल भवन गिरने की कगार पर है, जहां 29 छात्र खौफ के साए में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं.
वहीं सुरीपाटा के प्राथमिक शाला में सड़क निर्माण के बाद जलभराव की ऐसी समस्या खड़ी हो गई है कि बारिश के दिनों में बच्चों को मजबूरन पड़ोसी गांव डिमरापाल के स्कूल में शिफ्ट करना पड़ता है.
इन्फ्रास्ट्रक्चर की इस भारी कमी का एक और उदाहरण डोंगरीगुड़ा के तेली मारेंगा गांव में देखने को मिलता है, जहां साल 1961 में निर्मित प्राथमिक स्कूल पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुका है. यहां दर्ज 113 छात्र-छात्राओं की पढ़ाई को सुचारू रखने के लिए उन्हें पास के एक छोटे से आंगनबाड़ी केंद्र में बिठाया जा रहा है, जिसकी क्षमता बमुश्किल 20 बच्चों की है.
एक छोटे से कमरे में सौ से अधिक बच्चों को ठूंसकर पढ़ाने की इस विवशता से शिक्षक और छात्र दोनों ही परेशान हैं. शासन-प्रशासन की इस बेरुखी के चलते बस्तर के वनांचल क्षेत्रों में शिक्षा का बुनियादी ढांचा पूरी तरह चरमरा गया है, और बारिश से पहले यदि कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए तो किसी बड़े हादसे से इनकार नहीं किया जा सकता. Symbolic Photo