क्या खत्म हो रहे हैं अमेरिका के हथियार?
नई दिल्ली । डेस्क: ईरान के साथ शुरू हुए युद्ध ने अमेरिकी सैन्य मशीनरी की गहराई और उसके हथियारों के भंडार पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. युद्ध को शुरू हुए अभी दो सप्ताह भी नहीं हुए हैं, लेकिन पेंटागन को मजबूरन एशिया से अपने सबसे परिष्कृत हवाई रक्षा तंत्र को हटाकर मध्य पूर्व भेजना पड़ रहा है.
दक्षिण कोरिया में तैनात 'थाड' (THAAD) और पैट्रियट मिसाइल प्रणालियों को वहां से हटाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका के पास एक साथ दो मोर्चों पर चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त स्टॉक नहीं बचा है. अमेरिकी सैन्य कमांडरों ने स्वीकार किया है कि वे तेजी से घटते हथियारों के भंडार और उनके डाइवर्जन को लेकर बेहद चिंतित हैं.
आंकड़ों के नजरिए से देखें तो स्थिति और भी भयावह है. एक पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत लगभग 4 मिलियन डॉलर है और अमेरिका ने पूरे 2025 में ऐसी केवल 600 मिसाइलों का उत्पादन किया था.
अनुमान है कि युद्ध के शुरुआती 12 दिनों में ही 1,000 से अधिक ऐसी मिसाइलें दागी जा चुकी हैं. इसका मतलब है कि अमेरिका जितनी तेजी से मिसाइलें बना रहा है, उससे कहीं अधिक तेजी से वे युद्ध के मैदान में खर्च हो रही हैं.
केवल छह दिनों के भीतर युद्ध का खर्च 11.3 बिलियन डॉलर को पार कर गया है, जिसने अमेरिकी रक्षा बजट और उत्पादन क्षमता पर भारी दबाव डाल दिया है.
इस कमी का सबसे ज्यादा असर अमेरिका के एशियाई सहयोगियों पर पड़ रहा है.
जापान और ताइवान जैसे देश, जो पहले से ही चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों का सामना कर रहे हैं, अब हथियारों की डिलीवरी में भारी देरी की आशंका से डरे हुए हैं.
जापान की एक जांच में पता चला है कि 7.2 बिलियन डॉलर मूल्य के 118 अमेरिकी रक्षा ऑर्डर पहले ही पांच साल से अटके हुए हैं.
ताइवान के विशेषज्ञों का मानना है कि हथियारों की यह कमी उनकी सुरक्षा क्षमता को कमजोर कर रही है. दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली जे-म्युंग का यह कहना कि "दूसरों पर निर्भरता कभी भी ढह सकती है," अमेरिका की घटती सैन्य साख और खाली होते तरकश की ओर इशारा करता है.