ईरानी परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर हमले से खाड़ी के देश चपेट में आ जायेंगे
नई दिल्ली । डेस्क: ईरान के बुशहर परमाणु ऊर्जा संयंत्र पर हाल ही में हुए हमलों ने न केवल क्षेत्रीय तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है, बल्कि पूरी दुनिया को एक ऐसी परमाणु आपदा की दहलीज पर खड़ा कर दिया है जिसका असर ईरान की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहने वाला है. वर्तमान परिस्थितियों का सटीक विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि बुशहर संयंत्र पर किया गया कोई भी हमला सीधे तौर पर खाड़ी देशों (GCC) की सुरक्षा, पर्यावरण और जनजीवन पर हमला है.
शनिवार को संयंत्र के निकट हुए मिसाइल हमले ने, जिसमें एक सुरक्षा गार्ड की जान गई, उन आशंकाओं को पुख्ता कर दिया है कि भविष्य में कोई भी सीधा प्रहार पूरे मध्य पूर्व के लिए आत्मघाती साबित होगा. रणनीतिक रूप से बुशहर संयंत्र की स्थिति ऐसी है कि यहाँ से होने वाला कोई भी रेडियोधर्मी रिसाव हवा और पानी के बहाव के साथ खाड़ी के अन्य देशों की ओर ही रुख करेगा.
ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची का यह कहना कि 'रेडियोधर्मी विकिरण तेहरान को नहीं बल्कि खाड़ी देशों की राजधानियों को खत्म कर देगा', एक कड़वी भौगोलिक सच्चाई को दर्शाता है. यदि इस संयंत्र के रिएक्टर या उपयोग किए गए ईंधन भंडारण पूल को निशाना बनाया जाता है, तो हवा में सीज़ियम-137 जैसे घातक आइसोटोप घुल जाएंगे, जो दशकों तक कैंसर, जन्मजात विकृतियों और मिट्टी की विषाक्तता का कारण बनेंगे.
बुशहर संयंत्र पर हमले की स्थिति में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों में कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कुवैत, बहरीन और ओमान शामिल हैं. कतर, जो ईरान के बुशहर तट से मात्र 190 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है, इस आपदा का सबसे पहला और बड़ा शिकार बन सकता है. कतर सरकार के स्वयं के सिमुलेशन और वैज्ञानिक शोधों के अनुसार, बुशहर में किसी भी तरह के रिसाव के मात्र तीन दिनों के भीतर कतर का पीने योग्य पानी पूरी तरह खत्म हो जाएगा.
इसका मुख्य कारण यह है कि ये सभी खाड़ी देश अपनी पेयजल आपूर्ति के लिए पूरी तरह से समुद्र के पानी के विलवणीकरण (Desalination) पर निर्भर हैं. खाड़ी का समुद्र अपेक्षाकृत उथला है, जिससे रेडियोधर्मी कण पानी में लंबे समय तक बने रहेंगे.
वर्तमान की 'डिसैलिनेशन' तकनीक पानी से रेडियोधर्मी सामग्री को छानने में सक्षम नहीं है. इसका सीधा अर्थ यह है कि सऊदी अरब के तटीय शहर, दुबई की चमक और कुवैत की आबादी के पास पीने के लिए पानी की एक बूंद भी सुरक्षित नहीं बचेगी.
पानी का दूषित होना केवल प्यास तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह पूरी समुद्री खाद्य श्रृंखला को नष्ट कर देगा, जिससे मछली पालन और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का अंत हो जाएगा.
यह हमला एक तरह से खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्थिरता पर सीधा प्रहार है. यदि विकिरण फैलता है, तो रियाद, दोहा, अबू धाबी और कुवैत सिटी जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर लोगों को विस्थापित करना होगा, जो व्यावहारिक रूप से लगभग असंभव और विनाशकारी होगा.
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के महानिदेशक राफेल ग्रोसी की चेतावनी इसी ओर इशारा करती है कि एक रिएक्टर मेल्टडाउन की स्थिति में सैकड़ों किलोमीटर के दायरे में रेडिएशन की निगरानी करनी होगी और लोगों को तत्काल सुरक्षित स्थानों पर ले जाना होगा.
इसके अलावा, पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंडों ने इस संकट को और गहरा कर दिया है. यूक्रेन के ज़ापोरिज्जिया संयंत्र पर हमले के समय जो अंतरराष्ट्रीय आक्रोश देखा गया था, वह बुशहर के मामले में नदारद है. यह चुप्पी खतरनाक है क्योंकि यह हमला केवल ईरान के बिजली ग्रिड को ठप नहीं कर रहा, बल्कि खाड़ी के देशों में मानवीय त्रासदियों की आधारशिला रख रहा है.
अंततः, बुशहर परमाणु संयंत्र की सुरक्षा को केवल ईरान का घरेलू मुद्दा मानना एक बड़ी रणनीतिक भूल है. यह संयंत्र खाड़ी की सुरक्षा वास्तुकला का एक संवेदनशील बिंदु है. यदि यह क्षतिग्रस्त होता है, तो पूरा क्षेत्र एक ऐसे पारिस्थितिक और मानवीय अंधकार में डूब जाएगा, जिससे उबरने में कई सदियाँ लग सकती हैं. इसलिए, बुशहर पर हमला वास्तव में पूरे खाड़ी क्षेत्र के अस्तित्व पर हमला है.