अमेरिका को इस युद्ध में अपमानित होना पड़ा- जर्मन चांसलर
तेहरान । डेस्क: ईरान के तेहरान टाइम्स के हवाले से खबर है कि अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच हाल ही में समाप्त हुए 39 दिवसीय युद्ध के बाद अब कूटनीतिक गलियारों में इसके दूरगामी परिणामों पर चर्चा तेज हो गई है. वैश्विक नेताओं और विश्लेषकों का मानना है कि इस सैन्य टकराव में महाशक्ति अमेरिका को अपनी उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली, बल्कि उसे बड़े मोर्चे पर कूटनीतिक और सैन्य झटके झेलने पड़े हैं.
अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस बात को मजबूती तब मिली जब जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ ने एक बड़ा बयान देते हुए कहा कि अमेरिका को इस युद्ध में ईरान के नेतृत्व के हाथों अपमानित होना पड़ा है. यह बयान उस समय आया है जब दोनों देश युद्ध के बाद उपजे तनाव को शांत करने के लिए स्विट्जरलैंड के जिनेवा में बातचीत की मेज पर बैठे हैं, लेकिन पृष्ठभूमि में अमेरिका की सैन्य विफलता और आर्थिक नुकसान की गूंज साफ सुनाई दे रही है.
जिनेवा में महाशक्तियों की कूटनीतिक कशमकश:
तनावपूर्ण माहौल के बीच ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधिमंडल एक समझौता ज्ञापन (MoU) के क्रियान्वयन को आगे बढ़ाने के लिए जिनेवा में एकत्रित हुए हैं. इस उच्च स्तरीय वार्ता में ईरान की ओर से मुख्य वार्ताकार व संसद अध्यक्ष मोहम्मद बकर कलीबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची कमान संभाल रहे हैं. वहीं अमेरिकी पक्ष का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस कर रहे हैं, जिनके साथ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और उनके दामाद जेरेड कुशनर शामिल हैं.
इस बातचीत को सफल बनाने के लिए कतर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुर्रहमान अल थानी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ (मुख्य रक्षा बल प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ) कतर और पाकिस्तान की तरफ से संयुक्त मध्यस्थता कर रहे हैं.
हालांकि, बैठक की शुरुआत में ही ईरान ने कड़ा रुख अपनाते हुए अमेरिकी अधिकारियों के साथ किसी भी तरह के संयुक्त मीडिया अपीयरेंस, फोटो खिंचवाने या हाथ मिलाने से साफ इनकार कर दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि ईरान केवल ठोस बातचीत चाहता है, किसी प्रतीकात्मक जीत का हिस्सा नहीं बनना चाहता.
युद्ध की भारी कीमत और अमेरिकी विफलता की गूंज:
यह पूरी वार्ता उस युद्ध की छाया में हो रही है जिसे अमेरिका और इजरायल ने यह सोचकर शुरू किया था कि ईरान बहुत जल्द घुटने टेक देगा. लेकिन अमेरिकी मीडिया और खुद इजरायली समाचार पत्र 'इजरायल हायोम' के आकलनों के मुताबिक, यह सैन्य अभियान अपने रणनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने में पूरी तरह नाकाम रहा. इसके विपरीत, 39 दिनों तक चले इस युद्ध के बाद ईरान पहले से कहीं अधिक मजबूत और इजरायल कमजोर होकर उभरा है.
ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों ने फारस की खाड़ी में अमेरिकी ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया, जिसने वाशिंगटन को युद्धविराम स्वीकार करने पर मजबूर किया. इस युद्ध ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है. अर्थशास्त्रियों और डेमोक्रेटिक सांसदों के अनुसार, इस संघर्ष से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को 630 अरब डॉलर से लेकर 1 लाख करोड़ डॉलर तक का भारी नुकसान हुआ है.
इसके कारण ईंधन की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गईं और वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ गया, जिसने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए घरेलू राजनीति और आगामी मध्यावधि चुनाव में बड़ी मुश्किलें खड़ी कर दी हैं. जर्मन चांसलर का बयान इसी अमेरिकी लाचारी और रणनीतिक नाकामी की ओर इशारा करता है.
लेबनान पर तनाव और ट्रंप की नई धमकियां:
ईरानी प्रतिनिधिमंडल के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ किया है कि वार्ता में सबसे बड़ा मुद्दा इजरायल द्वारा लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ जारी हमले हैं. ईरान का कहना है कि समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने के बाद भी इजरायल ने लेबनान में दर्जनों लोगों को मारकर नियमों का उल्लंघन किया है, जो ईरान के लिए एक 'रेड लाइन' है.
इसके अलावा, अमेरिका द्वारा फ्रीज की गई ईरानी संपत्ति और तेल निर्यात की बहाली पर भी बात हो रही है. अपनी इस रणनीतिक विफलता और घरेलू मोर्चे पर हो रही आलोचनाओं से ध्यान भटकाने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर फिर से ईरान को धमकी दी है. ट्रंप ने लिखा है कि यदि ईरान ने लेबनान में अपने परोक्ष गुटों को नहीं रोका, तो उस पर पिछले हफ्ते से भी अधिक खतरनाक हमला किया जाएगा.
ट्रंप की यह आक्रामक बयानबाजी उस 14 सूत्रीय अंतरिम समझौते के बीच आई है जिसमें दोनों देशों ने 60 दिनों में स्थायी समाधान निकालने, इजरायली हमलों को रोकने, अमेरिकी प्रतिबंधों को हटाने और होर्मुज जलडमरू मध्य से नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करने का वादा किया है.
फिलहाल, अमेरिकी और इजरायली उल्लंघनों के विरोध में ईरान ने होर्मुज जलडमरू मध्य को सभी जहाजों के लिए बंद कर दिया है, जिससे वैश्विक व्यापारिक संकट और गहरा गया है.