HC ने 'जांच में खामी' पर CRPF हमला मामले में 4 की मौत की सज़ा बदली
प्रयागराज । डेस्क: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जांच में "खामी" का हवाला देते हुए बुधवार 29 अक्टूबर, 2025 को रामपुर जिले में 1 जनवरी, 2008 को हुए सीआरपीएफ कैंप हमले के मामले में चार व्यक्तियों की मौत की सज़ा और एक की आजीवन कारावास की सज़ा को रद्द कर दिया. इस हमले में सात जवान और एक रिक्शा चालक मारे गए थे.
कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष "मुख्य अपराध के लिए संदेह से परे मामला साबित करने में बुरी तरह विफल रहा", जो आपराधिक न्यायशास्त्र का एक "सुनहरा नियम" है. न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्र की खंडपीठ ने मोहम्मद शरीफ, सबाउद्दीन, इमरान शहज़ाद, मोहम्मद फारूक और जंग बहादुर खान को हत्या सहित अन्य गंभीर आरोपों से बरी कर दिया.
मुख्य बिंदु
बदली गई सज़ा: हाईकोर्ट ने पांचों अभियुक्तों को, जिन्हें निचली अदालत ने मौत या आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी, केवल आर्म्स एक्ट की धारा 25 (1-ए) के तहत दोषी पाया.
नई सज़ा: इन सभी को 10 साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई और उन पर एक-एक लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया.
जांच पर सवाल: कोर्ट ने जांच एजेंसी पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जांच में "खामी मामले की जड़ तक चली गई और अंततः अभियुक्तों की दोषमुक्ति में परिणत हुई."
पहचान की कमी: कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि प्राथमिकी (FIR) में गवाहों ने पहले कभी अभियुक्तों को नहीं जानने की बात कही थी और उनकी पहचान के लिए टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) भी नहीं कराई गई. कोर्ट ने कहा कि TIP के अभाव में, यह विश्वास करने का कोई आधार नहीं है कि चश्मदीदों ने वास्तव में अभियुक्तों को पहचाना था.
न्यायालय ने कहा, "केवल इसलिए कि अभियुक्त खूंखार अपराधी थे और पुलिस द्वारा पकड़े गए थे, यह उन्हें घटना से नहीं जोड़ता है." कोर्ट ने यह भी नोट किया कि जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के दौरान, गवाह यह स्थापित करने में विफल रहे कि उन्हें अभियुक्तों के नाम कब और कैसे पता चले, जबकि FIR के समय वे उनके नाम नहीं जानते थे.