ईरान में मारे गए लोगों में 45 फीसदी नागरिक थे
तेहरान । डेस्क: ईरान के 'फाउंडेशन ऑफ मार्टयर्स एंड वेटरन्स अफेयर्स' के सलाहकार जमशेद नजमी ने हालिया संघर्ष के विनाशकारी आंकड़े जारी करते हुए पुष्टि की है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों में अब तक 3,468 लोगों की जान जा चुकी है. एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए नजमी ने बताया कि मारे गए लोगों में से लगभग 45 प्रतिशत यानी 1,460 नागरिक थे.
28 फरवरी को शुरू हुआ यह युद्ध करीब 40 दिनों तक चला, जिसने ईरान की बुनियादी संरचना को झकझोर कर रख दिया है. रिपोर्टों के अनुसार, इन हमलों में न केवल सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, बल्कि स्कूल, अस्पताल, ऊर्जा संयंत्र और परिवहन नेटवर्क जैसे नागरिक बुनियादी ढांचे को भी भारी नुकसान पहुँचाया गया है.
युद्ध के पहले ही दिन होर्मोज़गन प्रांत के मिनाब शहर में एक अमेरिकी टॉमहॉक मिसाइल सीधे 'शजरेह तैयबा स्कूल' पर गिरी, जिसमें 170 लोग मारे गए, जिनमें से अधिकांश स्कूली बच्चे थे. मिनाब के जनरल प्रॉसेक्यूटर इब्राहिम ताहेरी ने विवरण देते हुए बताया कि मृतकों में 120 छात्र थे, जिनमें 73 लड़के और 47 लड़कियां शामिल थीं. इसके अलावा 26 महिला शिक्षकों, सात अभिभावकों और एक स्कूल बस चालक की भी इस हमले में जान चली गई.
फोरेंसिक विशेषज्ञों के लिए शवों की पहचान करना एक बड़ी चुनौती थी, और सात वर्षीय माकन नसीरी जैसे बच्चों का तो डीएनए परीक्षण के बाद भी कोई सुराग नहीं मिल सका है.
युद्ध की विभीषिका केवल स्कूलों तक सीमित नहीं रही. मध्य ईरान के अराक शहर में एक हमले में तीन दिन के नवजात और उसकी दो साल की बहन की मौत ने दुनिया को झकझोर दिया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक टेड्रोस एडहानॉम घेब्रेयेसस ने पुष्टि की है कि ईरान में स्वास्थ्य सेवाओं पर कम से कम 13 हमले हुए हैं. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का हवाला देते हुए कहा कि स्वास्थ्य केंद्रों की सुरक्षा अनिवार्य है.
हमले की चपेट में ईरान का ऐतिहासिक 'पाश्चर संस्थान' भी आया, जो 1920 से संक्रामक रोगों के अनुसंधान और वैक्सीन उत्पादन का प्रमुख केंद्र रहा है. इसके अलावा विश्वविद्यालयों, ईंधन डिपो, पुलों और रेलवे लाइनों को भी बमबारी का निशाना बनाया गया.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस युद्ध को ईरान की सैन्य क्षमता को बेअसर करने और वहां की जनता की मदद के लिए एक आवश्यक अभियान बताया था. हालांकि, उनके स्वयं के बयान इस दावे पर सवाल खड़े करते हैं. जनवरी में ईरान में आर्थिक तंगी को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों को उकसाते हुए "मदद आने वाली है" जैसे संदेश पोस्ट किए थे, जिसके बाद व्हाइट हाउस ने हवाई हमलों को एक विकल्प के रूप में पेश किया.
ईरानी अधिकारियों का आरोप है कि अमेरिका और इजरायल ने जानबूझकर अशांति भड़काई और फिर इसे युद्ध का आधार बनाया. 8 अप्रैल को हुए संघर्ष विराम से पहले ट्रंप ने ईरान को धमकी दी थी कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो "पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी".
वहीं इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने हाल ही में बयान दिया कि वे ईरान को "पत्थर युग" में भेजने के लिए वाशिंगटन से हरी झंडी का इंतजार कर रहे हैं. इस तरह की बयानबाजी और धरातल पर मची तबाही ने पश्चिमी देशों के "मानवीय मिशन" के दावों की पोल खोल दी है.
नागरिक हताहतों की बढ़ती संख्या, अस्पतालों पर हमले और बुनियादी ढांचे का विनाश यह स्पष्ट करता है कि यह युद्ध सुरक्षा या सहायता के लिए नहीं, बल्कि विनाश के लिए लड़ा गया था.
ईरान के आम नागरिक अब उन खंडहरों के बीच खड़े हैं जिन्हें कभी उनके घर, स्कूल और कार्यस्थल कहा जाता था, और दुनिया के सामने अब यह सवाल बड़ा हो गया है कि क्या 'मुक्ति' की भाषा के पीछे छिपी यह तबाही वास्तव में न्यायसंगत थी.