छत्तीसगढ़ में कैंसर से हर दिन 43 मौतें
छत्तीसगढ़ में कैंसर से होने वाली मौतों के आंकड़े भयावह हैं
रायपुर | संवाददाताः छत्तीसगढ़ में कैंसर महामारी का रूप लेता जा रहा है. 33 जिलों वाले छत्तीसगढ़ में हर दिन औसतन 43 लोगों की कैंसर से मौत हो रही है.
सरकारी आंकड़ों की मानें तो छत्तीसगढ़ में कैंसर पीड़ित हर दूसरे व्यक्ति को अपनी जान गंवानी पड़ रही है.
सरकार दावा करती है कि कैंसर से निपटने के लिए पर्याप्त इंतजाम किए जा रहे हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत अलग है.
छत्तीसगढ़ में कैंसर ने दूसरे राज्यों को पीछे छोड़ दिया है. मुंह के कैंसर से लेकर फेफड़े के कैंसर तक के मरीज राज्य के हर हिस्से में बढ़ते जा रहे हैं.
सरकारी आंकड़ों की मानें तो राज्य में लगभग 30 हज़ार कैंसर पीड़ित हैं, लेकिन इस आंकड़े का दूसरा सच ये है कि अधिकांश कैंसर पीड़ित अस्पतालों के दरवाज़े तक ही नहीं पहुंच पाते और वो कभी भी सरकारी आंकड़ों में दर्ज़ नहीं हो पाते.
कैंसर से पीड़ित हर दूसरे मरीज की मौत
राज्य में कैंसर की भयावहता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि 2022 में राज्य में कैंसर पीड़ितों की संख्या 29,253 थी.
उसी साल कैंसर से मरने वालों का आंकड़ा 16,057 था. यानी हर साल कैंसर के जितने मरीज़ मिलते हैं, उनमें से आधे से अधिक लोगों की मौत हो जाती है.
इसे और सरल तरीके से कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ में कैंसर पीड़ित हर दूसरे व्यक्ति को अपनी जान गंवानी पड़ रही है.
लगातार बढ़ रहे मरीज
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में राज्य में कुल 27,828 कैंसर के नए मामले दर्ज किए गए थे.
करीब 15,219 लोगों की मौत कैंसर की वजह से हुई.
वहीं साल 2021 में कैंसर के मरीजों की संख्या बढ़कर 28,529 हो गई और मौतों का आंकड़ा 15,666 तक पहुंच गया.
2022 में यह संख्या और बढ़ी और कैंसर पीड़ितों का कुल आंकड़ा 29,253 पर जा पहुंचा. इस साल 16,057 लोगों की कैंसर से मौत हुई.
2023 में कैंसर मरीजों की संख्या 30,014 पर पहुंच गयी.
जांच का अभाव
अगर कैंसर से होने वाली मौतों पर बात की जाए तो इसका सबसे बड़ा कारण है- बीमारी का देर से पता चलना.
अक्सर लोग शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज कर देते हैं या जानकारी के अभाव में समय पर डॉक्टर के पास नहीं पहुंच पाते.
जिसके कारण बीमारी तब सामने आती है, जब वह गंभीर अवस्था में पहुँच चुकी होती है.
इलाज की बढ़ी लागत और अस्पतालों की दूरी
दूसरा बड़ा कारण है इलाज की लागत. कैंसर का इलाज लंबा और महंगा होता है और अधिकांश लोग इसे अपनी जेब से चुकाते हैं.
यह आर्थिक बोझ इलाज को अधूरा छोड़ने या टालने का कारण बनता है. तीसरा कारण है बीमारी के बारे में जागरूकता की कमी.
ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में लोगों को यह जानकारी नहीं होती कि कैंसर के लक्षण क्या हैं और किस समय जांच कराना जरूरी है.
इसके अलावा, राज्य में तृतीयक देखभाल (जैसे कि कैंसर के विशेष अस्पताल या उपचार केंद्र) की संख्या सीमित है और वे अधिकतर शहरों में स्थित हैं.
दूर-दराज के क्षेत्रों से वहाँ तक पहुंचना मुश्किल होता है, जिससे समय पर इलाज मिल पाना संभव नहीं हो पाता. कई बार तो मरीज़ों की मौत रास्ते में ही हो जाती है.
शराब और तंबाकू सेवन से सबसे ज्यादा कैंसर
छत्तीसगढ़ में अधिक संख्या में पुरुषों और महिलाओं द्वारा शराब एवं तंबाकू का सेवन मुँह और गले के कैंसर का मुख्य कारण है.
इसके अलावा पुरुषों में फेफड़े का कैंसर भी पाया जाता है. इसी तरह महिलाओं में ग्रीवा यानी सर्वाइकल कैंसर के मामले सर्वाधिक हैं.
जिसके पीछे मुख्य रूप से संक्रमण और स्वच्छता की कमी बड़ा कारण है. छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में महिलाएं स्तन कैंसर से भी जूझ रही है.
लेकिन सबसे बड़ा कारण शराब और तंबाकू सेवन को माना जाता है. कैंसर को रोकने के लिए, उसके कारणों पर रोक की ज़रुरत है.
पर सरकारें न तो कैंसर को रोक पा रही हैं और ना ही उसके कारणों को.
अगर इसे बहुत सरलीकरण नहीं माना जाए तो यह कहना गलत नहीं होगा कि सरकार की नीतियां कैंसर को बढ़ावा देने का काम कर रही हैं.
राष्ट्रीय औसत से ज्यादा शराब की खपत
केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में 35.9 प्रतिशत पुरुष और 2.8 प्रतिशत महिलाएं शराब का सेवन करती है.
देश के औसत की बात करें तो देश में 22.4 फीसदी पुरुष और केवल 0.7 फीसदी महिलाएं शराब पीती हैं.
यह अंतर स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ में नशे की प्रवृत्ति अन्य राज्यों की तुलना में अधिक गंभीर है.
सत्ता में आते ही स्मृति लोप का शिकार
विपक्ष में रहते हुए शराबबंदी की मांग करनेवाले राजनीतिक दल सत्ता में आते ही स्मृति लोप का शिकार हो जाते हैं.
भयावह यह है कि सत्ता से हटते ही उन्हें फिर से शराबबंदी की याद सताने लग जाती है. कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों को विपक्ष में रहते हुए ही शराब एक बुराई की तरह नज़र आती है.
लेकिन सत्ता में हरेक सरकार शराब को बढ़ावा देने के लिए तरह-तरह के उपाय करती है.
प्रति व्यक्ति बढ़ गया शराब पर खर्च
छत्तीसगढ़ में शराब को लेकर सरकार की नीति और उसकी खपत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि राज्य में दस साल पहले 2014-15 में शराब पर प्रति व्यक्ति वार्षिक खर्च महज 500 रुपये था.
जबकि 2022-23 में यह खर्च बढ़ कर 1227 रुपया हो गया.
शराब नीति का विस्तार और अस्पताल बीमार
राज्य की भाजपा सरकार ने तो अब रेस्तरां और होटलों में भी शराब परोसने की इजाजत दे दी है.
नई शराब दुकान खोल कर शराबियों को और अधिक से अधिक सुविधा देने की कोशिश हो रही है.
ये और बात है कि राज्य के कई हिस्सों में इसी शराब के कारण होने वाले कैंसर की जांच और इलाज के लिए खोले गए अस्पतालों में डॉक्टरों की नियुक्ति सरकार आज तक नहीं कर पाई.
कैंसर के इलाज की सुविधाओं के विस्तार की बात तो जाने ही दें. ज़ाहिर है सरकारों की प्राथमिकता कुछ और है. कैंसर से बचना है, तो जनता को खुद ही अपनी फिक्र करनी होगी.