वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ: PM मोदी ने विशेष सिक्का-डाक टिकट जारी किया
नई दिल्ली । डेस्क: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार, 7 नवंबर को नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में राष्ट्रगान 'वंदे मातरम' के 150वें वर्ष के उपलक्ष्य में साल भर चलने वाले भव्य स्मरणोत्सव का शुभारंभ किया. यह समारोह बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा 1875 में लिखे गए इस गीत की 150वीं वर्षगांठ का प्रतीक है, जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय गौरव का एक प्रतीक बन गया.
कार्यक्रम से पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने एक्स पर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए लिखा, “7 नवंबर हर भारतीय के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है. हम वंदे मातरम के 150 गौरवशाली वर्ष मना रहे हैं, यह एक ऐसी प्रेरणादायक पुकार है जिसने पीढ़ियों को प्रेरित किया है और हमारे राष्ट्र में देशभक्ति की एक अमिट भावना को प्रज्वलित किया है.”
इस अवसर को सम्मान देते हुए, प्रधानमंत्री ने एक विशेष स्मारक सिक्का और डाक टिकट का अनावरण किया. उन्होंने अपने संबोधन में लेखक बंकिम चंद्र चटर्जी के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया, जिनकी कलम ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के पूर्ण रूप लेने से बहुत पहले ही प्रतिरोध की भावना जगा दी थी.
मोदी ने कहा कि वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे राष्ट्र की धड़कन है जिसने झुकने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि मातृभूमि के प्रति प्रेम का इसका संदेश आज भी भारतीयों को प्रेरित करता है और यह क्षेत्रों, भाषाओं तथा पीढ़ियों से परे दिलों को एकजुट करता है.
प्रधानमंत्री ने गीत की अक्षय शक्ति पर भी बात की. उन्होंने याद दिलाया कि 1937 में, मूल गीत के कुछ महत्वपूर्ण छंदों को हटा दिया गया था, जिसने लोगों को विभाजित किया और भारत के विभाजन के मार्ग को भी प्रभावित किया.
पीएम ने आगाह किया कि वही विभाजनकारी सोच आज भी मौजूद है और हमेशा ऐसी आवाजें उठती रहती हैं जो लोगों को गुमराह करने या उन पर संदेह पैदा करने की कोशिश करती हैं. उन्होंने कहा, ऐसे समय में, वंदे मातरम सभी को भारत की शक्ति और एकता की याद दिलाता है.
प्रधानमंत्री ने भारत की महान क्षमता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश में 140 करोड़ लोग हैं, जिनमें से अधिकांश युवा हैं, जिससे भारत को एक बड़ा लाभ मिलता है. उन्होंने कहा कि इसका मतलब है कि राष्ट्र के लिए कुछ भी असंभव नहीं है. उन्होंने भारतीयों से आग्रह किया कि वे प्रेरित, आत्मविश्वासी और एकजुट रहें, और गीत की भावना को भविष्य में ले जाएं.
इस बीच, देशभर में देशभक्ति की लहर दौड़ गई और लाखों लोग राष्ट्रव्यापी 'वंदे मातरम' के सामूहिक पाठ में शामिल हुए. स्कूलों, कार्यालयों, सेना शिविरों और मंदिरों से आवाजें गूंज उठीं. 19वीं सदी के विद्वान, उपन्यासकार और विचारक बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में पहली बार वंदे मातरम लिखा था, जो बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ (1882) का हिस्सा बना.
मोदी ने अपने संबोधन में हर भारतीय से आग्रह किया कि वे गीत के पीछे के संदेश को केवल इतिहास की याद के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र के सांस्कृतिक और भावनात्मक बंधन की एक जीवंत अभिव्यक्ति के रूप में याद रखें. उन्होंने कहा कि 150 वर्ष का मील का पत्थर युवा पीढ़ी को भारत की जड़ों से जुड़ने और स्वतंत्रता के लिए किए गए बलिदानों का सम्मान करने के लिए प्रेरित करना चाहिए.