शी जिनपिंग का फैसला: चीनी सेना के 52% शीर्ष कमांडर बर्खास्त
बीजिंग । डेस्क: चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी यानी पीएलए के भीतर इन दिनों एक ऐसा तूफान उठा है, जिसने पूरी दुनिया के रक्षा विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अचानक अपनी सेना के शीर्ष नेतृत्व पर बड़ी गाज गिराई है. गलवान घाटी और डोकलाम विवाद के मुख्य साजिशकर्ता जनरल झाओ जोंगकी समेत कई हाई-प्रोफाइल सैन्य अधिकारियों को पदों से हटा दिया गया है. बर्खास्तगी के साथ ही ये शीर्ष कमांडर रहस्यमयी परिस्थितियों में लापता भी हो गए हैं. इस अभूतपूर्व कार्रवाई के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या राष्ट्रपति जिनपिंग किसी संभावित तख्तापलट के डर से अपने विरोधियों को रास्ते से हटा रहे हैं या फिर इसके पीछे वजह कुछ और है.
सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के दो सबसे बड़े चेहरे भी बेदखल
रॉयटर्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, अगस्त के अंतिम सप्ताह में राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पीएलए के तीन सबसे ताकतवर जनरलों-झाओ जोंगकी, झांग युशिया और लियू झेनली को उनके पदों से हटा दिया. इनमें से झांग युशिया चीन की सबसे ताकतवर सैन्य संस्था 'सेंट्रल मिलिट्री कमीशन' के उपाध्यक्ष थे, जबकि लियू झेनली जॉइंट स्टाफ डिपार्टमेंट के चीफ ऑफ स्टाफ की जिम्मेदारी संभाल रहे थे.
चीन की सेना भारत या अन्य लोकतांत्रिक देशों की तरह सीधे सरकार के अधीन नहीं होती, बल्कि यह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना की सैन्य शाखा है, जिसे सेंट्रल मिलिट्री कमीशन नियंत्रित करता है. इस आयोग के अध्यक्ष खुद शी जिनपिंग हैं. भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का हवाला देकर की गई इस कार्रवाई के बाद ये अधिकारी सार्वजनिक मंचों से गायब हैं.
अमेरिकी थिंक टैंक का खुलासा: नेतृत्व के भारी संकट में फंसी लाल सेना
अमेरिकी थिंक टैंक 'सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज' की एक विस्तृत रिपोर्ट ने चीन के इस आंतरिक संकट की परतें खोली हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, शी जिनपिंग ने हाल के समय में लाल सेना के 101 से अधिक उच्च पदस्थ अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया है, जिनमें से अधिकतर का अब कोई अता-पता नहीं है. इस व्यापक फेरबदल के कारण पीएलए को अचानक अपने 52 प्रतिशत शीर्ष सैन्य कमांडरों को खोना पड़ा है.
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बेजिंग ने इन खाली पड़े संवेदनशील पदों पर नए अधिकारियों की नियुक्ति भी तुरंत नहीं की है. सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों के अचानक हटने से चीनी सेना में एक बड़ा नेतृत्व संकट पैदा हो गया है, जिससे किसी भी संभावित युद्ध स्थिति में चीन की युद्ध क्षमता पर गहरा असर पड़ सकता है.
गलवान और डोकलाम के 'मास्टरमाइंड' पर क्यों गिरी गाज
इस पूरी कार्रवाई में सबसे चर्चित नाम जनरल झाओ जोंगकी का है. साल 2016 में शी जिनपिंग ने झाओ को वेस्टर्न थियेटर कमान का प्रमुख बनाया था, जिसके अंतर्गत भारत से लगती रणनीतिक सीमाएं, तिब्बत और शिनजियांग आते हैं. पद संभालने के महज एक साल भीतर 2017 में उन्होंने डोकलाम में सड़क निर्माण का दुस्साहस किया, जिससे भारत और चीन के बीच 72 दिनों तक गतिरोध चला और अंततः पीएलए को पीछे हटना पड़ा.
इस नाकामी का बदला लेने के लिए जनरल झाओ ने जून 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर अचानक हमला करने का आदेश दिया. इस हिंसक झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हुए थे, लेकिन भारतीय सेना के करारे पलटवार में चीन के 35 से 45 सैनिक मारे गए थे.
गलवान कांड के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की काफी फजीहत हुई और उसके विदेशी व्यापार को भी भारी नुकसान पहुंचा. भारत को नीचा दिखाने की झाओ की योजना पूरी तरह उल्टी पड़ गई और चीन का 'सुपरपावर' होने का भ्रम टूट गया. इसी नाकामी के चलते दिसंबर 2020 में उन्हें कमान से हटाकर राजनीतिक सलाहकार निकाय में भेज दिया गया था और अब उन्हें वहां से भी बेदखल कर दिया गया है.
तख्तापलट का डर या सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण की सनक
चीन में 2012 से शी जिनपिंग के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ा सफाई अभियान चल रहा है, लेकिन तीन चार-सितारा जनरलों की एक साथ रवानगी केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं दिखती. जानकारों का कहना है कि एकदलीय शासन व्यवस्था वाले चीन में सत्ता का संतुलन किसी भी वक्त बिगड़ने की आशंका बनी रहती है. शी जिनपिंग को डर है कि सेना के भीतर असंतोष पनप सकता है, जो उनके खिलाफ सैन्य तख्तापलट का रूप ले सकता है.
सात सदस्यों वाले सेंट्रल मिलिट्री कमीशन में अब शी जिनपिंग के अलावा केवल एक सदस्य बचा है. अपनी गद्दी बचाने और सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करने के लिए जिनपिंग जिस तरह अपने ही जनरलों को निपटा रहे हैं, उससे भविष्य में भारत सीमा पर चीन के आक्रामक रवैये में कमी आने की संभावना जताई जा रही है.