दुनिया को नए 'प्लाजा समझौते' की जरूरत नहीं- ग्लोबल टाइम्स
बीजिंग । डेस्क: हाल ही में संपन्न हुए यूरोपीय संघ (EU) शिखर सम्मेलन के बाद, जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ द्वारा चीनी मुद्रा 'रेनमिम्बी' (युआन) की विनिमय दर को लेकर दिए गए बयान ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है. चांसलर मर्ज़ ने दावा किया कि चीनी मुद्रा का मूल्य वास्तविक स्तर से लगभग 30 प्रतिशत तक कम आंका गया है. उन्होंने इसके समाधान के रूप में 1985 के ऐतिहासिक "प्लाजा समझौते" का हवाला दिया, जिसके कारण कभी जापान आर्थिक मंदी के लंबे दौर में चला गया था.
चीनी सरकारी समाचार पत्र 'ग्लोबल टाइम्स' ने अपने संपादकीय में इस रुख की कड़ी आलोचना की है. लेख में स्पष्ट किया गया है कि यूरोपीय नेताओं द्वारा चीन-यूरोपीय संघ के आर्थिक संबंधों को "प्रणालीगत खतरे" के रूप में पेश करना असल में यूरोपीय विनिर्माण क्षेत्र की आंतरिक घबराहट, संरक्षणवादी मानसिकता और रणनीतिक स्वायत्तता के झूठे भ्रम को दर्शाता है.
संपादकीय के अनुसार, यूरोपीय विनिर्माण क्षेत्र इस समय ऊर्जा की ऊंची कीमतों, नवाचार में कम निवेश, कमजोर औद्योगिक नीतियों और यूक्रेन संकट के दुष्प्रभावों से जूझ रहा है. इसके अलावा, अमेरिकी औद्योगिक सब्सिडी भी उसकी रीढ़ तोड़ रही है.
ऐसे में अपनी कमियों को छिपाने के लिए चीनी मुद्रा को निशाना बनाना जर्मन या यूरोपीय बाजार की समस्याओं का समाधान नहीं हो सकता. चीनी कंपनियों की वैश्विक सफलता उनकी मजबूत तकनीकी क्षमता, विशाल घरेलू बाजार और प्रतिस्पर्धी औद्योगिक प्रणाली की देन है, न कि किसी कृत्रिम विनिमय दर हेरफेर की.
इतिहास गवाह है कि 1985 में अमेरिका ने जब अपने व्यापारिक सहयोगियों के साथ 'प्लाजा समझौता' किया था, तब येन के मजबूत होने के बाद भी अमेरिका का व्यापार घाटा कम होने के बजाय बढ़ गया था. इसका मुख्य कारण अमेरिका की अपनी घरेलू आर्थिक विसंगतियां थीं, जो "उच्च उपभोग और कम बचत" पर आधारित थीं.
आज यूरोप के कुछ राजनेता उसी पुरानी और विफल राजनीतिक चाल को दोहराकर अपनी नाकामियों का ठीकरा चीन के सिर फोड़ना चाहते हैं. वर्ष 2025 में चीन और जर्मनी के बीच व्यापार 250 अरब यूरो से अधिक का रहा है, और करीब 5,200 जर्मन कंपनियां चीन में सक्रिय रूप से काम कर रही हैं. जर्मन चैंबर ऑफ कॉमर्स के हालिया सर्वेक्षण के मुताबिक, 61 प्रतिशत जर्मन कंपनियां अगले दो वर्षों में चीन में अपना निवेश बढ़ाने की योजना बना रही हैं.
ऐसे में केवल कागजी व्यापार घाटे को देखकर एकतरफा निष्कर्ष निकालना और 'डी-रिस्किंग' के नाम पर व्यापारिक दीवारें खड़ी करना खुद यूरोपीय उपभोक्ताओं और उनकी आपूर्ति श्रृंखला के लिए आत्मघाती साबित होगा.
चीन ने साफ कर दिया है कि आज का चीन अतीत का जापान नहीं है. 140 करोड़ से अधिक की आबादी, मजबूत औद्योगिक आधार और नीतिगत स्वायत्तता के साथ चीन अब 160 से अधिक देशों का प्रमुख व्यापारिक भागीदार है.
यूरोप को यह स्वीकार करना होगा कि तकनीक और विनिर्माण के क्षेत्र में चीन की प्रगति को रोका नहीं जा सकता. दुनिया को आज किसी नए 'प्लाजा समझौते' के जरिए दबाव बनाने की नहीं, बल्कि आपसी सम्मान, सुधार और सह-विकास पर आधारित एक नए वैश्विक सर्वसम्मति की आवश्यकता है.
प्लाजा समझौता क्या था:
प्लाजा समझौता (Plaza Accord) 22 सितंबर 1985 को न्यूयॉर्क शहर के प्लाजा होटल में दुनिया की पांच प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं-अमेरिका, पश्चिम जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और जापान (G-5)-के बीच हुआ एक ऐतिहासिक वित्तीय समझौता था. इस समझौते का मुख्य उद्देश्य अमेरिकी डॉलर के मूल्य में कमी लाना और जापानी येन तथा जर्मन डॉयचे मार्क की कीमत को बढ़ाना था.
उस समय अमेरिका भारी व्यापार घाटे से जूझ रहा था, विशेषकर जापान के साथ, क्योंकि मजबूत डॉलर के कारण अमेरिकी उत्पाद वैश्विक बाजार में महंगे और जापानी उत्पाद बेहद सस्ते हो गए थे. इस असंतुलन को ठीक करने के लिए इन देशों के केंद्रीय बैंकों ने विदेशी मुद्रा बाजार में बड़े पैमाने पर हस्तक्षेप किया, जिससे देखते ही देखते डॉलर की कीमत गिर गई और जापानी येन का मूल्य दोगुना तक बढ़ गया.
हालांकि, इस समझौते ने अमेरिका के व्यापार घाटे को तुरंत कम नहीं किया, बल्कि इसके विपरीत जापान के लिए यह एक बड़ी आर्थिक आपदा साबित हुआ. येन के अत्यधिक मजबूत होने से जापान के निर्यात को भारी धक्का लगा, जिससे निपटने के लिए वहां की सरकार ने ब्याज दरें घटा दीं.
इस अत्यधिक तरलता के कारण जापान के शेयर और रियल एस्टेट बाजार में एक बड़ा बुलबुला (Bubble) बन गया, जो 1990 के दशक की शुरुआत में फूट गया. इसके बाद जापान एक लंबी आर्थिक मंदी और ठहराव के दौर में चला गया, जिसे इतिहास में जापान के "खोए हुए दशक" (Lost Decades) के रूप में जाना जाता है.
यही कारण है कि आज भी इस समझौते को किसी देश की मुद्रा पर राजनीतिक दबाव बनाने के एक विवादास्पद उपकरण के रूप में देखा जाता है.