नेपाल के लोग दवाइयां खाने से क्यों परहेज करते हैं?
काठमांडू । डेस्क: नेपाल में गैर-संचारी रोग (नॉन-कम्युनिकेबल डिज़ीज़–NCDs) तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन इन बीमारियों से पीड़ित बड़ी आबादी समय पर दवाइयां शुरू नहीं कर रही है. उच्च रक्तचाप, मधुमेह, थायरॉयड, कोलेस्ट्रॉल, अस्थमा जैसी बीमारियों के मरीज दवाइयों की लागत, साइड इफेक्ट का डर, आजीवन दवा खाने की आशंका और सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में दवाओं की अनियमित उपलब्धता के कारण इलाज से परहेज कर रहे हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह देरी स्ट्रोक, हार्ट अटैक और पक्षाघात जैसी गंभीर जटिलताओं का खतरा बढ़ा रही है.
41 वर्षीय नाई राजेश ठाकुर पिछले कई महीनों से उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, लेकिन उन्होंने डॉक्टरों द्वारा बताई गई दवाइयां अब तक शुरू नहीं की हैं. वे घरेलू उपायों पर निर्भर हैं. ठाकुर का कहना है कि तेज सिरदर्द होने पर वे पेनकिलर, करेला और एलोवेरा का सेवन करते हैं. उनका मानना है कि एक बार ब्लड प्रेशर की दवा शुरू हो गई तो जीवनभर लेनी पड़ेगी, जिसे वहन करना उनके लिए मुश्किल है.
डॉक्टर चेतावनी देते हैं कि बार-बार पेनकिलर लेना बहु-अंग विफलता तक का कारण बन सकता है, जबकि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में कई आवश्यक दवाइयां निःशुल्क उपलब्ध हैं.
हालांकि, मरीजों का अनुभव अलग है. ठाकुर जैसे कई लोग सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर निर्भर नहीं रह पाते, क्योंकि वहां अक्सर मुफ्त दवाइयां खत्म हो जाती हैं. देशभर में यह धारणा आम है कि गैर-संचारी रोगों की दवाइयां महंगी हैं और लंबे समय तक चलती हैं, जिससे परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ता है.
डॉक्टरों का कहना है कि हजारों ब्रांड और दवाओं के संयोजन होने के कारण हर मरीज के लिए एक जैसी दवा उपयुक्त नहीं होती. कई बार मरीज को अधिक खुराक की जरूरत होती है, जो मुफ्त आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल नहीं होती. कुछ स्वास्थ्यकर्मी कम खुराक की कई गोलियां एक साथ लेने की सलाह देते हैं, लेकिन मरीज इसे असहज मानते हैं.
मकवानपुर जिले की रहने वाली सुषिला तमांग, जो काठमांडू के तारकेश्वर इलाके में निर्माण स्थल पर मजदूरी करती हैं, भी उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं. तीन बच्चों की मां सुषिला कहती हैं कि उन्हें सुबह जल्दी काम पर जाना होता है और दवा खाली पेट नहीं ली जा सकती. ऐसे में दवा लेना उनके लिए व्यावहारिक नहीं हो पाता.
बार-बार ब्लड प्रेशर बढ़ने-घटने से उन्हें काम से छुट्टी लेनी पड़ती है, जिससे आमदनी प्रभावित होती है.
अध्ययनों के अनुसार, नेपाल में गैर-संचारी रोगों से पीड़ित लगभग आधे लोग अपनी बीमारी से अनजान हैं, क्योंकि आमतौर पर लक्षण उभरने से पहले स्वास्थ्य जांच नहीं कराई जाती.
शेष 50 प्रतिशत में से करीब 30 प्रतिशत डॉक्टर तक पहुंचते हैं, लेकिन उनमें भी केवल 10–15 प्रतिशत ही नियमित रूप से निर्धारित दवाइयां लेते हैं.
स्वास्थ्य एवं जनसंख्या मंत्रालय के संयुक्त प्रवक्ता और गैर-संचारी रोगों के फोकल पर्सन डॉ. समीर कुमार अधिकारी के अनुसार, नेपाल में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और इलाज की प्रवृत्ति कमजोर है.
मरीज अक्सर तब इलाज शुरू करते हैं, जब बीमारी गंभीर हो जाती है. दवाइयों से जुड़ा डर, खर्च और सामाजिक-आर्थिक कारण भी उपचार से दूरी बढ़ाते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गैर-संचारी रोगों की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए, तो कम खर्च और जीवनशैली में बदलाव से इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है. इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. ओम मूर्ति अनिल के मुताबिक, देश में गैर-संचारी रोग खतरनाक स्तर तक बढ़ चुके हैं और इन्हें रोकने के लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत है.
नेपाल बर्डन ऑफ डिज़ीज़ रिपोर्ट के अनुसार, 2017 में कुल मौतों में 66 प्रतिशत मौतें गैर-संचारी रोगों से हुई थीं.
यह आंकड़ा 2019 में बढ़कर 71.1 प्रतिशत हो गया, जबकि ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज़ 2021 के मुताबिक, देश में 73 प्रतिशत मौतों की वजह गैर-संचारी रोग हैं.
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर दवाइयों के प्रति झिझक और देरी की प्रवृत्ति नहीं बदली, तो हालात और गंभीर हो सकते हैं.