ईरान की अर्थव्यवस्था क्यों फेल हो रही है?
रायपुर । संवाददाता: ईरान में हालिया विरोध प्रदर्शनों की जड़ में गहराता आर्थिक संकट है. अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि दशकों से चली आ रही भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का नतीजा है. SOAS विश्वविद्यालय के एमेरिटस प्रोफेसर हसन हकीमियन के मुताबिक, “लंबे समय से जारी आर्थिक बदइंतज़ामी और व्यापक भ्रष्टाचार को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने और भी गंभीर बना दिया है, जिससे आम लोगों की जिंदगी बदहाल हो गई है.”
पर्यावरणीय संकट ने बढ़ाई मुश्किलें
आर्थिक बदहाली के साथ-साथ पर्यावरणीय समस्याओं ने हालात और बिगाड़ दिए हैं. बीते कुछ महीनों में ईरान को गंभीर जल संकट, लगातार बिजली कटौती और खतरनाक स्तर के वायु प्रदूषण का सामना करना पड़ा है. इन सभी कारणों ने मिलकर एक “परफेक्ट इकोनॉमिक स्टॉर्म” खड़ा कर दिया है, जिसमें आम नागरिक सबसे ज्यादा पिस रहे हैं.
रियाल की गिरावट और अर्थव्यवस्था की सांसें
ईरानी मुद्रा रियाल की कीमत में ऐतिहासिक गिरावट ने हालात को विस्फोटक बना दिया. 28 दिसंबर को डॉलर के मुकाबले रियाल रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया, जिसने विरोध प्रदर्शनों को और हवा दी. दिसंबर 2025 में जहां एक डॉलर करीब 13.6 लाख रियाल का था, वहीं जनवरी की शुरुआत में यह 14.2 लाख रियाल तक गिर गया. सिर्फ छह महीनों में रियाल की कीमत में 56 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई.
इंटरनेट बंद, कारोबार ठप
सरकार द्वारा नेशनल इंफॉर्मेशन नेटवर्क के तहत इंटरनेट जैसी सुविधाओं पर नियंत्रण ने अर्थव्यवस्था को और नुकसान पहुंचाया. एटीएम सेवाएं बंद रहीं, उड़ानों और मुद्रा लेन-देन पर रोक लगी. वर्जीनिया टेक के प्रोफेसर जवाद सालेही-इस्फ़हानी के अनुसार, “अगर एक महीने तक अर्थव्यवस्था 50 प्रतिशत क्षमता पर चलती है, तो देश की जीडीपी का लगभग 10 प्रतिशत नुकसान हो सकता है, जिसकी कीमत 20 से 90 अरब डॉलर के बीच हो सकती है.”
प्रतिबंधों का लंबा इतिहास
ईरान दुनिया के सबसे ज्यादा प्रतिबंधित देशों में शामिल है. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद अमेरिका ने सबसे पहले प्रतिबंध लगाए और ईरानी तेल आयात रोक दिए. इसके बाद 1995 में अमेरिकी कंपनियों को ईरान के तेल-गैस क्षेत्र में निवेश से रोका गया.
2006 में संयुक्त राष्ट्र ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर प्रतिबंध लगाए, जिन्हें बाद में और सख्त किया गया. 2015 में परमाणु समझौते (JCPOA) से थोड़ी राहत मिली, लेकिन 2018 में अमेरिका के बाहर निकलते ही सारे प्रतिबंध फिर से लागू हो गए.
तेल आय पर ताला
वर्तमान में ईरान की लगभग सारी तेल आय जमी हुई है. विदेशी संपत्तियां फ्रीज हैं, बैंकिंग और व्यापार पर कड़े प्रतिबंध हैं. चीन आज ईरान के 80 प्रतिशत से ज्यादा तेल का खरीदार है, लेकिन यह व्यापार भी “शैडो फ्लीट” के जरिए होता है, जो प्रतिबंधों से बचने के लिए ट्रैकिंग बंद कर देता है.
महंगाई, बेरोजगारी और घटती क्रय शक्ति
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ईरान की अर्थव्यवस्था “स्टैगफ्लेशन” के दौर में फंसी है जहां विकास दर बेहद कम और महंगाई आसमान छू रही है. IMF के अनुसार आर्थिक वृद्धि महज 0.6 प्रतिशत है, जबकि आदर्श दर 2 से 3 प्रतिशत मानी जाती है.
पिछले आठ वर्षों में ईरानियों की क्रय शक्ति 90 प्रतिशत से ज्यादा गिर चुकी है. खाद्य पदार्थों की कीमतें एक साल में औसतन 72 प्रतिशत बढ़ गई हैं. इसके साथ ही लगभग हर पांचवां युवा बेरोजगार है.
बाज़ारियों का गुस्सा और सड़कों पर उतरना
विशेषज्ञों के मुताबिक, रियाल की गिरावट ने परंपरागत रूप से सरकार समर्थक माने जाने वाले बाज़ारियों को भी नाराज कर दिया. ईरानी-अमेरिकी अर्थशास्त्री नादर हबीबी बताते हैं कि जब दुकानदारों को यह भरोसा नहीं रहा कि वे सामान बेचकर दोबारा उसी कीमत पर खरीद पाएंगे, तो उन्होंने दुकानें बंद कर विरोध का रास्ता अपनाया.
आगे क्या?
हाल के दिनों में हिंसा और मौतों की वजह से प्रदर्शन कुछ शांत हुए हैं, लेकिन गुस्सा खत्म नहीं हुआ है. विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार के पास कोई त्वरित समाधान नहीं है. हसन हकीमियन के शब्दों में, “बल प्रयोग से विरोध दबाया जा सकता है, लेकिन मूल समस्याएं बनी रहेंगी.”
बाहरी सैन्य हस्तक्षेप को भी समाधान नहीं माना जा रहा, क्योंकि इससे क्षेत्रीय संघर्ष और जटिल हो सकता है.
ईरान की अर्थव्यवस्था का मौजूदा संकट केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हुआ है. जब तक प्रतिबंध, कुप्रबंधन और संरचनात्मक समस्याओं का समाधान नहीं होता, तब तक यह संकट और गहराने की आशंका बनी रहेगी.