सोम, 19 अक्टू. 2026

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वॉशिंगटन की सख्ती और बीजिंग की मिठास के बीच पश्चिमी देशों का 'बैलेंसिंग एक्ट'

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18 फ़र. 2026, 07:49 PM 3 मिनट में पढ़ें 1

शी जिनपिंग
शी जिनपिंग

नई दिल्ली । डेस्क: बीजिंग में हाल के दिनों में पश्चिमी देशों के राष्ट्राध्यक्षों का जमावड़ा लगा हुआ है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और ब्रिटेन के कीर स्टारमर की चीन यात्राओं के बाद अब जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ भी बीजिंग जाने की तैयारी में हैं. वैश्विक कूटनीति के गलियारों में इन दौरों को अमेरिका से दूर जाने और चीन के करीब आने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन गहराई से विश्लेषण करने पर तस्वीर कुछ और ही नजर आती है. 


दरअसल, यह कोई 'रणनीतिक पाला बदलना' नहीं, बल्कि 'आर्थिक व्यावहारिकता' का एक नया चरण है, जिसे 'थर्ड पाथ' या तीसरा रास्ता कहा जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की नीतियों, विशेषकर उनके द्वारा सहयोगियों पर बनाए गए आर्थिक दबाव और व्यापार युद्ध ने पश्चिमी देशों को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है. कनाडा के पीएम मार्क कार्नी ने दावोस में स्पष्ट रूप से कहा था कि अमेरिका के नेतृत्व वाली नियम-आधारित व्यवस्था अब एक 'विघटन' के दौर में है.

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हालाँकि, बीजिंग के प्रति यह राजनयिक झुकाव चीन के प्रति किसी प्रेम का परिणाम नहीं है, बल्कि ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिजों और आपूर्ति श्रृंखलाओं में अपनी स्वायत्तता सुरक्षित करने की एक कोशिश है. पश्चिमी नेता यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि वे महाशक्तियों की खींचतान में केवल कोलेटरल डैमेज बनकर न रह जाएं. इन यात्राओं के दौरान होने वाले संयुक्त बयानों में सहयोग की बात तो होती है, लेकिन कोई बुनियादी रणनीतिक बदलाव नहीं दिखता. 


ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण यहाँ सबसे सटीक है, जिसने सुरक्षा चिंताओं के कारण डार्विन बंदरगाह को चीनी लीज से वापस लेने का फैसला किया, जबकि वह बंदरगाह मुनाफे में था और आधिकारिक समीक्षाओं में कोई तत्काल खतरा नहीं पाया गया था. यह दर्शाता है कि जब बात सुरक्षा और गठबंधन की आती है, तो आर्थिक लाभ पीछे छूट जाते हैं. यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के लिए अमेरिका के साथ उनकी साझा पहचान, संस्कृति और संस्थागत ढांचा (जैसे नाटो और फाइव आइज) एक ऐसी दीवार है जिसे चीन की 'चेकबुक डिप्लोमेसी' नहीं गिरा सकती.


एशियाई सहयोगियों जैसे जापान और दक्षिण कोरिया के लिए तो अमेरिकी गठबंधन उनके अस्तित्व का आधार है. चीन का उदय उनके मन में पुरानी ऐतिहासिक असुरक्षाओं को जन्म देता है. यही कारण है कि दक्षिण कोरिया की चिप कंपनियां भले ही चीन से व्यापार बंद करने का विरोध करें, लेकिन वे तकनीकी शोध के लिए अमेरिका पर ही भरोसा करती हैं. 


इस पूरी स्थिति को कैलकुलेटेड हिपोक्रेसी कहा जा सकता है, जहाँ सहयोगी देश सार्वजनिक रूप से तो अमेरिका की कठोर नीतियों की आलोचना करते हैं, लेकिन निजी तौर पर उसी के सुरक्षा कवच के नीचे शरण लेते हैं. 


चीन के पास दुर्लभ खनिजों और एआई तकनीक की ताकत तो है, लेकिन उसके पास वह 'भरोसा' नहीं है जो किसी व्यापारिक साझेदार को रणनीतिक सहयोगी में बदल सके. अंततः, ये यात्राएं अमेरिका की दमनकारी नीतियों की विफलता को तो दर्शाती हैं, लेकिन चीन के प्रति किसी बड़े झुकाव की पुष्टि नहीं करतीं. 


पश्चिमी देशों का यह 'तीसरा रास्ता' वास्तव में एक खतरनाक संतुलन है, जहाँ वे अमेरिका से दूरी तो बनाना चाहते हैं, लेकिन सुरक्षा के लिए उनके पास कोई दूसरा विकल्प मौजूद नहीं है. यह कहानी वैश्विक पाले बदलने की नहीं, बल्कि कठिन समय में अपने वजूद को बचाए रखने के संघर्ष की है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP