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क्या अमरीकी दबाव में FCRA बिल पारित नहीं हुआ?

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14 अग. 2026, 07:36 AM 4 मिनट में पढ़ें 3

FCRA Bill
FCRA Bill

नई दिल्ली । डेस्क: संसद के सत्र के दौरान फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट एक्ट यानी एफसीआरए (FCRA) संशोधन विधेयक को लेकर केंद्र सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं. लोकसभा में विपक्ष के भारी हंगामे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका के कड़े रुख के बाद मोदी सरकार ने इस बहुचर्चित और विवादित विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने का फैसला किया है. विपक्षी दलों का दावा है कि सरकार को न केवल देश के भीतर अल्पसंख्यक संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ा, बल्कि अमरीकी दबाव के कारण भी बिल को फिलहाल ठंडे बस्ते में डालना पड़ा है.


कानून में बदलाव और धर्म परिवर्तन का विवाद


केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित चौथे एफसीआरए संशोधन में कई नए प्रावधान शामिल किए गए हैं. इसके तहत यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द या समाप्त होता है, तो विदेशी धन से अर्जित उसकी संपत्तियों की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए एक विशेष समिति गठित की जाएगी. इसके अलावा, विदेशी अनुदान से जुड़े पंजीकरण का अधिकार पूरी तरह से केंद्र या केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन के पास होगा.

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इस विधेयक का सबसे विवादित पहलू धर्मांतरण से जुड़ा मुद्दा है. सरकार इस कानून के दायरे से धर्मांतरण गतिविधियों को पूरी तरह बाहर रखना चाहती है या उस पर कड़े प्रतिबंध लगाना चाहती है. इसी बिंदु पर अमरीका और भारत के विपक्षी दलों ने तीखी आपत्ति दर्ज कराई है.


अमरीकी कांग्रेस की चेतावनी और विदेश मंत्रालय का जवाब


विवाद उस समय और गहरा गया जब अमरीकी कांग्रेस के सदस्य राइली मूर ने इस विधेयक पर नई दिल्ली को खुले तौर पर चेतावनी दी. मूर का आरोप था कि यह कानून भारत में ईसाई समुदाय और उनके द्वारा संचालित धर्मार्थ संस्थाओं को सीधे तौर पर निशाना बनाने के लिए लाया जा रहा है, जिससे भारत-अमरीका के द्विपक्षीय संबंधों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. उनका कहना था कि इस कानून से सरकार को चर्चों और धार्मिक संस्थाओं पर नियंत्रण पाने की खुली छूट मिल जाएगी.


अमरीकी बयान पर कड़ा रुख अपनाते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत में कानून बनाना देश का आंतरिक मामला है और इसमें किसी भी बाहरी देश का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उन्होंने याद दिलाया कि अमरीका समेत कई अन्य देश भी अपने यहाँ विदेशी फंडिंग को सख्ती से नियंत्रित करते हैं.


संसद में तीखी बहस और विपक्ष के आरोप


लोकसभा में इस विधेयक को पेश किए जाने के साथ ही विपक्षी सांसदों ने सरकार पर चौतरफा हमला बोला. कांग्रेस सांसद के.सी. वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि एक तरफ जहां सत्तारूढ़ दल से जुड़े संगठन भारी विदेशी अनुदान प्राप्त कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को परेशान करने के लिए यह बिल लाया गया है.


समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और डीएमके नेता टी.आर. बालू ने भी इस विधेयक को अल्पसंख्यक विरोधी बताते हुए इसे पूरी तरह रद्द करने की मांग की. विपक्ष का तर्क है कि कानून के नए प्रावधानों के तहत सरकार विदेशी अनुदान से बनी संपत्तियों को जब्त करने का अधिकार अपने पास रखना चाहती है, जिससे स्वतंत्र रूप से काम कर रही संस्थाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा.


पूर्वोत्तर की चिंताएं और जेपीसी का गठन


इस विधेयक को लेकर केवल विपक्ष ही नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर के राज्यों से भी चिंताएं जताई गई हैं. मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने इस संबंध में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से बात की है. हालांकि, उन्हें आश्वासन दिया गया है कि नए विधेयक का असर पूर्वोत्तर के विशेष हितों पर नहीं पड़ेगा.


संसद में हुए भारी हंगामे के बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने विधेयक को जेपीसी के पास भेजने का प्रस्ताव रखा, जो सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया गया. अब 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (जिसमें 21 सदस्य लोकसभा से और 10 सदस्य राज्यसभा से होंगे) इस विधेयक के हर पहलू की बारीकी से समीक्षा करेगी. जेपीसी की रिपोर्ट आने के बाद ही इस विधेयक के भविष्य का फैसला हो सकेगा.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP