US में CO2 को 'प्रदूषक' गैस की सूची से हटाने सिफारिश, वैज्ञानिकों में विवाद
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) ने हाल ही में घोषणा की है कि कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) को अब तक जितना 'प्रदूषक' माना जाता था, वह उतना हानिकारक नहीं है. ट्रम्प प्रशासन ने इसे ग्रीनहाउस गैसों की सूची से हटाने की सिफारिश की है.
2007 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 'क्लीन एयर एक्ट' के तहत CO2 को ग्रीनहाउस गैस के रूप में मान्यता दी थी, जिसके कारण इसे 'वायु विष' माना गया. लेकिन अब ईपीए कोयला और गैस आधारित बिजली संयंत्रों से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की सीमा को बदलने की कोशिश कर रही है, जिससे जलवायु परिवर्तन से निपटने की उसकी क्षमता सीमित हो सकती है.
कुछ पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों का मानना है कि यह निर्णय उद्योगों के दबाव में लिया गया है. उनका कहना है कि औद्योगिक गतिविधियों और वाहनों के कारण CO2 का स्तर प्री-इंडस्ट्रियल युग की तुलना में 50% से अधिक बढ़ गया है, जो जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण है.
दूसरी ओर, कुछ वैज्ञानिकों का तर्क है कि सामान्य स्तर पर CO2 विषाक्त नहीं है और यह पौधों के प्रकाश संश्लेषण और प्राणियों के श्वसन के लिए आवश्यक है. हालांकि, उच्च सांद्रता में यह खतरनाक हो सकता है, क्योंकि यह ऑक्सीजन को विस्थापित कर श्वासावरोध या हाइपरकैपनिया का कारण बन सकता है.
पर्यावरण संरक्षण एजेंसी प्रशासक ली जेल्डिन ने कहा कि बाइडन प्रशासन के दौरान निर्धारित कार्बन उत्सर्जन मानक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहे थे. इस मुद्दे पर कानूनी बहस तेज हो गई है.
गैर-लाभकारी संगठन अर्थजस्टिस की उपाध्यक्ष जिल टॉबर ने कहा कि सरकारी वैज्ञानिकों की राय उनके अनुभव से मेल नहीं खाती और उद्योगों के लिए सख्त नियंत्रण जरूरी हैं.
कॉर्नेल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डैनियल विशनर के अनुसार, मानवजनित CO2 प्राकृतिक स्रोतों से आने वाले CO2 से 10 गुना अधिक है, जिसे नियंत्रित करना जरूरी है. हालांकि, प्राकृतिक CO2 को 'प्रदूषक' कहना विवादास्पद है.
ट्रम्प प्रशासन के ऊर्जा विभाग ने हाल ही में 141 पन्नों की एक रिपोर्ट जारी की, जिसमें पांच प्रमुख पर्यावरण वैज्ञानिकों ने वर्तमान गैस उत्सर्जन नियमों को रद्द करने के पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के प्रयास को वैज्ञानिक आधार पर सही ठहराया है.
इस महीने से इस मुद्दे पर सार्वजनिक सुनवाई शुरू होगी, जिसके परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन नीतियों पर बड़ा प्रभाव पड़ सकता है.