ट्रंप की नई टैरिफ चेतावनी से नहीं मिटेगी आधुनिक गुलामी
वाशिंगटन । डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा व्यापारिक भागीदारों पर लगाए जाने वाले नए टैरिफ की धमकी को लेकर विवाद खड़ा हो गया है. विशेषज्ञों, व्यापारिक संगठनों और मानवाधिकार समूहों का मानना है कि जबरन श्रम (फोर्सड लेबर) को रोकने के नाम पर उठाए जा रहे इस कदम से आधुनिक गुलामी को खत्म करने में कोई मदद नहीं मिलेगी, बल्कि इससे स्थिति और बिगड़ सकती है.
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) कार्यालय ने जबरन श्रम से बने सामानों के व्यापार पर लगाम न लगाने का आरोप लगाते हुए 60 देशों से होने वाले आयात पर 10 से 12.5 फीसदी अतिरिक्त ड्यूटी लगाने का प्रस्ताव दिया है, जिसे सहयोगी देशों ने सिरे से खारिज कर दिया है.
विश्लेषकों का कहना है कि इस कदम का मुख्य उद्देश्य जबरन श्रम को रोकना नहीं, बल्कि व्यापार शुल्क लगाने के लिए एक नया बहाना ढूंढना है, विशेषकर तब जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में ट्रंप के आपातकालीन टैरिफ को अमान्य घोषित कर दिया था.
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में करीब 2.76 करोड़ लोग जबरन श्रम का शिकार हैं, जिनमें से आधी आबादी मैन्युफैक्चरिंग, कृषि और खनन जैसे निर्यात से जुड़े क्षेत्रों में काम करती है.
विशेषज्ञों के अनुसार, यह नई नीति वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाल श्रम और शोषण की गहरी समस्याओं को हल करने में पूरी तरह नाकाम साबित होगी.
इस फैसले के तहत यूरोपीय संघ (EU) को भी निशाने पर लिया गया है, जिसकी आलोचना करते हुए अमेरिका ने उसके 'फोर्सड लेबर रेगुलेशन' को कमजोर बताया है.
हालांकि, कानूनी और मानवाधिकार विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोपीय संघ का आगामी कानून, जो दिसंबर 2027 से लागू होगा, अमेरिकी नियमों की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और प्रभावी है क्योंकि यह आयात और निर्यात दोनों पर समान रूप से लागू होता है.
मानवाधिकार संगठन 'ह्यूमन राइट्स वॉच' और अन्य आर्थिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि शोषण की गंभीरता के बजाय केवल व्यापार की मात्रा के आधार पर लगाए जा रहे ये मनमाने टैरिफ भू-राजनीतिक हितों से प्रेरित हैं. इससे संबंधित देशों में राजनीतिक प्रतिरोध बढ़ेगा, जो आधुनिक गुलामी के खिलाफ वैश्विक लड़ाई को कमजोर कर सकता है.